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Friday, October 26, 2012

शरद पूर्णिमा

ब्रजराज तेरी याद भुलाई नहीं जाती 
ये प्रेम कहानी है, सुने नहीं जाती 
तुम मेरे मसीहा हो, करो दर्द का दावा 
उठी टीस कलेजे में, दबाई नहीं जाती 
मुझे इतनी पिला दे, के फिर होश ही न आये 
या साफ़ कहदे की पिलाई नहीं जाती 
मै ढूंढ रहीं हूँ मगर, तेरा दर नहीं मिलता 
दर दर की ठोकरें हैं, खाई नहीं जाती 


वृन्दावन की गोपियों से लेकर दर्द दीवानी मीरा तक, इस सांवरी सलोनी सूरत के अनेक दीवाने और आशिक हुए हैं और हर प्रेमी का भाव इतना विलक्षण होता है कि चर्चा करते करते ज़िन्दगी छोटी लगने लगती है। हर प्रेमी अपने अलग ढंग से अपने ठाकुर को रिझाता है और अपने अनोखे भाव ठाकुर के चरणों में समर्पित करता है। कोई सकाम भक्ति करता है तो कोई निष्काम भक्ति करता है। कोई उनसे कुछ नहीं चाहता तो कोई उनसे सब कुछ चाहता है। हर भक्त उनके अलग अलग रूप की पूजा करता है, कोई बनके बिहारी को मानता  है, कोई राधा रमण को, कोई राधा वल्लभ को, कोई द्वारिकाधीश को तो कोई श्री नाथ जी को। परन्तु कन्हैया के हर प्रेमी के ह्रदय में एक समानता होती है, उनका हर भक्त उनके साथ रास करना चाहता है। ये इच्छा हर साधक के मन में होती है की प्रभु उसे भी अपने उस दिव्य महारास का दर्शन कराएं। बंधुओ यह महारास लीला कोई साधारण लीला नहीं है। मुझे तो उन पर दया आती है जो इस अद्भुत लीला को संदेह की निगाह से देखते है। बड़े बड़े योगी और स्वयं योगेश्वर भगवन शिव अपने ध्यान में इसी महारास का चिंतन करते हैं और उन्हें भी इसके दर्शन नहीं हो पाते। श्रीमद्भागवत जैसे परम विशाल ग्रन्थ में भी महारास का विस्तृत वर्णन नहीं मिलता। श्री शुकदेव जी महाराज भी इस लीला के रहस्य को रजा परीक्षित से छुपा गए क्यूंकि इस महारास का वर्णन नहीं, इसका तो केवल दर्शन हो सकता है। इसका वर्णन कौन करेगा? और इसका दर्शन भी और कोई नहीं स्वयं किशोरी जी अपने कृपा पात्रों को कराती है। जैसा की पूज्य गुरुदेव बताते हैं, महारास तक पहुँचने की तीन सीढियां हैं, सबसे पहले तो हमें संसार की मोह-माया से विरक्त होके श्री धाम वृन्दावन में वास करना होता है, उसके बाद किसी रसिक आचार्य की शरण में स्वामी जी का दास बनना होता है और जब हमारी भक्ति परिपक्व स्तिथि पे पहुच जाएगी तो राधे जू कृपा करेंगी और हमें रास का दर्शन होगा। 


ये महारास की लीला भगवन ने द्वापर युग में रचाई थी और आज से साढ़े पांच हज़ार वर्ष पूर्व इस लीला का विश्राम भी हो गया था, परन्तु आज से 500 वर्ष पूर्व जब अनन्य रसिक नृपति स्वामी श्री हरिदास जी महराज जब वृन्दावन पधारे तो निधिवन के कुंजो में उन्होंने पुनः इस महारास की दिव्या लीला का प्रारंभ करवाया और यह परंपरा आज तक निधिवन में प्रतिदिन होती है, हर रात वहां रास होता है। और इस निकुंज की लीला का वर्णन स्वामी जी ने अपने पदों में किया जिनका संग्रह केलिमाल में हमें प्राप्त होता है। स्वामी जी ने रास में कितना सुंदर लिखा है:
सुन धुन मुरली वन बाजे हरी रास रचो 
कुञ्ज कुञ्ज द्रुम बेली प्रफुल्लित, मंडल कंचन मणिन खचो 
निरखत जुगल किशोर जुबती जन, मन मेरे राग केदारो मचो 
श्री हरिदास के स्वामी श्यामा, नीके री आज प्यारो लाल नचो 


इस महारास का एक अटूट अंग गोपी गीत भी है। गोपी गीत के बारे में तो किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है। भागवत पुराण के प्राण बसते हैं गोपी गीत में। और गोपी गीत का कारन भी हमें ज्ञात ही है। जब भगवन गोपियों के अहंकार को दूर करने के लिए उनके सामने से अदृश्य हुए थे तो गोपियों ने सुर में रुदन किया था और इस गोपी गीत को गया था। गोपियाँ यमुना से पूछती थी, कभी निधिवन से पूछती थी, कभी तुलसी से पूछती थी और जब भगवान् नहीं मिले तो गोपियों ने ढूंढना बंद कर दिया और फिर वो प्रभु के प्रेम में खो गयी। वास्तविकता में भी इस दुनिया के लोग ढूँढने से मिलते होंगे, पर मेरे बनके बिहारी तो खोने से ही मिलते है। "किसी से उनकी मंजिल का पता पाया नहीं जाता, जहाँ वो हैं फरिश्तों से वहां जाया नहीं जाता". किसी भक्त ने गोपियों के भावों को बड़े सुंदर शब्द में लिखा जो आपको बताना चाहता हूँ:

सबब रूठने का बता कर तो जाते 
हमें भी ज़रा आजमाकर तो जाते 
फिज़ाओं से पुछा कई बार तुमको 
झलक बस ज़रा सी दिखा कर तो जाते 
मुस्कुरा रही थी चमन में बहारें
मुहब्बत के नगमे सुना कर तो जाते 
दिया दर्द-इ-दिल कोई शिकवा नहीं है 
पता तुम अपना बता कर तो जाते 
अगर बेसबब थी हमारी शिकायत 
ज़रा आँख हमसे मिलाकर तो जाते
ज़रा और रुकते तो होती इनायत 
जनाज़ा हमारा उठा कर तो जाते  

गोपी और महारास के भावों का वर्णन करना तो इस लेख की सीमाओं से परे है और ये तुच्छ बुद्धि भी इस लायक नहीं है की निकुंज लीला के एक कण की भी चर्चा कर सके। मैंने तो केवल एक छोटा सा प्रयास किया है की आपको रास के रस से अवगत करा सकूँ। यह महारास लीला अश्विन पूर्णिमा के दिन ही हुई थी जिसे हम शरद पूर्णिमा के रूप में जानते हैं। इस वर्ष शरद पूर्णिमा 29 अक्टूबर को मनाई जाएगी और वृन्दावन के भक्ति मंदिर में 'साध्वी' पूर्णिमा जी (पूनम दीदी) की भाव पूर्ण भजन संध्या का विशाल आयोजन किया गया है। आप सब भक्त वहां सादर आमंत्रित हैं। शरद पूर्णिमा के दिन तो वृन्दावन के दर्शनों का अति विशेष महत्व है। अपने देखा होगा की ठाकुर श्री बांके बिहारी जी कभी अपने हाथ में मुरली नहीं रखते, परन्तु शरद पूर्णिमा के संध्या कालीन दर्शनों में बिहारी जी के हाथ में मुरली, कटी काछनी और सर पर मोर-मुकुट का श्रृंगार होता है। बिहारी जी अपने कक्ष से बहार भक्तों के समीप आ जाते है। मंदिर के प्रांगन को एक वन का रूप दिया जाता है जिसमे एक चांदी के घरोंदे में प्रभु आसीन होते हैं। सांवली सूरत पे पूर्ण श्वेत पोशाक इस प्रकार सुशोभित होती है जैसे अँधेरे आकाश में चन्द्रमा। आ के दिन तो चाँद के भी भाग्य उदय हो जाते हैं क्यूंकि आज तो मंदिर उस समय तक खुला रहता है जब तक चाँद बिहारी जी के चरणों को स्पर्श ना कर ले। आप सब जानते होंगे की बिहारी जी पश्चिम दिशा में पूर्व की तरफ मुख करके खड़े हुए हैं और शरद पूर्णिमा पे चाँद भी पूर्व से ही उदय होता है। इसलिए आज मंदिर के सामने वाली खिड़की और रोशनदान खोल दिए जाते हैं जिससे चाँद दर्शन पा सके। 


बिहारी जी के श्रृंगार यूँ तो अनंत हैं, पर फिर भी मर्यादाओं का पालन करते हुए मै यहीं अपने शब्दों को विराम देता हूँ और यही प्रार्थना करता हूँ की हमें प्रभु के चरणों का नुराग इसी प्रकार बना रहे और हमें भी वो मुरली वाला एक दिन गोपी बनाकर अपने साथ रास में ले चले। इसी आशा को मन में रखते हुए मई आप सबको हमारे परिवार की तरफ से शरद पूर्णिमा की बहुत बहुत शुभकामना देता हूँ और गुरु चरणों में प्रणाम करता हूँ। 


~~~~~~~ श्री राधे ~~~~~~ 




Saturday, October 13, 2012

नवरात्रों के रंग, शेरोंवाली के संग

आप सब लोग समझ ही गए होंगे कि आज के लेख की पृष्ठभूमि क्या है. आज एक बात आप सब बंधुओ को दिल से बताना चाहता हूँ. बहुत दिनों से दिल में एक अरमान है और एक उत्सुकता है कि आप लोगों को एक लीला का दर्शन अपने लेख के माध्यम से करवाऊं जो मुझे विश्वास है कि अधिकतर भक्तों ने नहीं सुनी होगी. परन्तु धन्य है ये हमारे भारत की भूमि जहाँ एक के बाद एक पर्व और त्यौहार आते ही रहते हैं और मुझे आपको इन सबके विषय में कुछ बताने का दिल करता है. कई बार गहन चिंतन में डूबता हूँ तो ये ख्याल आते हैं कि अगर इन त्यौहारों के रंग हमारे जीवन में न हो, तो यह जिंदगी जो पहले से ही इतनी चिंतामग्न रहती है और भी नीरस हो जायेगी और इसे संभालना एक बोझ हो जायेगा. इन त्यौहारों के माध्यम से हमारे जीवन में हर्षोल्लास और एक सकारात्मक उर्जा का प्रसार होता है जो हमारी मुश्किलों मो कम तो नहीं करती परन्तु उनका सामना करने कि शक्ति हमें प्रदान करती है. जब जिंदगी की परेशानियों से हाम हारने लगते हैं तो यह पर्व ही हैं जो हमें कहते हैं कि क्या हुआ अगर मुसीबतें हैं मत भूल कि यहाँ मज़ा भी बड़ा आता है. और जब इन सतरंगी त्यौहारों के साथ अध्यात्म का आठवां रंग मिल जाए तो आनंद की सीमा नहीं रहती और वैसे भी बंधुओ ये तो हमारे पूर्वजों की मान्यताएं हैं कि किसी तिथि को हम विशेष रूप से मनाने लगते हैं वर्ना तो जिस दिन इश्वर का आगमन हमारे जीवन में हो जाये वो हर दिन होली और हर रात दिवाली है. इसलिए संत कितना सुंदर कहते हैं 

तुम्हारा आना फाल्गुन की बहारों जैसा है
तुम्हारा आना सावन की फुहारों जैसा है
ये शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की तिथियाँ क्या गिनना
तुम्हारी तो याद का आना भी त्यौहारों जैसा है

और धन्य हैं हमारे त्यौहार जो केवल इश्वर की याद नहीं दिलाते अपितु भगवान को ही हमारे आंगन में उतार लातें हैं और धन्य हैं हम जो हमें इस पवित्र भूमि भारत में जन्म लेने का सुअवसर प्राप्त हुआ. वैसे तो पितृ-पक्ष के साथ त्यौहारों का मौसम दस्तक दे ही चुका है, पर जो पर्व हम श्राद्ध विसर्जन के ठीक अगले दिन शुरू करेंगे उसका नाम है "नवरात्र".


महामाया, महादायालू, महाशक्ति, सुख्करनी, दुख्हरनी, परम ममतामयी अष्टभुजी भवानी माँ शेरोवाली को समर्पित यह नवरात्रि पूरे भारत में बड़े धूम धाम से मनाया जाता है. चाहे वैष्णव हो, शैव हो, इस पर्व को प्रत्येक संप्रदाय के अनुयायी बड़ी श्रद्धा और भक्तिभाव से मानते हैं क्यूंकि शक्ति कि ज़रूरत तो हर किसी को पड़ती है.  यदि हम राधे जू कि भी भक्ति करते हैं और उसकी शुरुआत भी माँ जगदम्बा से ही प्रारंभ होती है. हमारे शास्त्रों में ४ बीज मन्त्रों का व्याख्यान आया है -- "एं, भ्रीम्, श्रीं और क्लीम्". ये चारों बीज मंत्र जब तक कोई साधक सिद्ध नहीं कर लेता उसे भक्ति का अनुभव होना मुश्किल है. पहला बीज मंत्र है 'एं' जिसकी अधिष्ठात्री देवी माँ दुर्गा हैं. माँ दुर्गा ही शक्तिस्वरूपा हैं. और जैसा मै पहले भी लिख चुका हूँ कि इस संसार में हम कोई भी कर्म करें भले ही वेह भक्ति से सम्बंधित न हो तो भी हमें शक्ति कि आवश्यकता होती है. यहाँ तक कि चोर को चोरी करने के लिए भी माँ दुर्गा की कृपा चाहिए. और यदि इस शक्ति को इस कृपा को हम भक्ति और अध्यात्म में इस्तमाल करें तो बात बहुत आगे बढ़ जाती है. हमें बैरंग्ताओं में भी शक्ति चाहिए. हम यदि माँ दुर्गा के विग्रह की तरफ नज़र डालें तो देखते हैं कि माँ कि आठ भुजाएं हैं जिनमे से एक हाथ से माँ आशीर्वाद दे रही है और शेष सात भुजाओं में माँ ने शस्त्र धारण कर रखे हैं. ये शस्त्र हमें डराने के लिए बल्कि असुरी वृतियों के संघार के लिए हैं. जब हम भक्ति के पथ पर अग्रसर होते है तो हमारे अंदर अनेक बुराइयां और कल्मष होते हैं. जब हम माँ दुर्गा की शरण ग्रहण करते हैं तो धीरे धीरे माँ अपनी ममता और करुना से इन सबका दमन कर देती हैं और हमें इस लायक बना देती हैं कि परमात्म तत्व की प्राप्ति हमें हो सके. इसलिए कोई भी भक्त माँ दुर्गा कि ज़रूरत को नज़रंदाज़ नहीं कर सकता, जब तक माँ कृपा न करे बात आगे बढ़ ही नहीं सकती. इसके बाद सगला बीज मंत्र है 'भ्रीम्' अर्थार्थ हृष्टि, पुष्टि और तुष्टि. हम स्वस्थ रहे क्यूंकि बिना उत्तम स्वास्थ्य के प्रभु चरणों का अनुराग नहीं हो सकता. फ़िर है 'श्रीं' जिसकी अधिष्ठात्री हैं माँ लक्ष्मी जो धन और ऐश्वर्य की देवी हैं. भक्ति मार्ग में भी हमें धन की उपयुक्त मात्रा की आवश्यकता होती है जो हमें माँ लक्ष्मी की कृपा से प्राप्त होता है और जब यह सब हो जाता है तब आता है 'क्लीम्' अर्थार्थ करुणा और प्रेम जिसकी अधिष्ठात्री हमारी बरसाने वारी राधा प्यारी है. 

उन्ही माँ दुर्गा को समर्पित यह नवरात्रे वर्ष में २ बार आते हैं और साथ मैया जी को हमारे आंगन में ले आते हैं. इस वर्ष शारदीय नवरात्रि मंगलवार, १६ अक्टूबर से प्रारंभ हो रहे हैं और बुधवार २४ अक्टूबर को दशहरा मनाया जायेगा. देश के अलग अलग प्रान्तों में इस पर्व को विभिन्न तरीकों से मनाया जाता है. बंगाल में दुर्गा पूजा के माध्यम से, गुजरात से डांडिया आदि नृत्यों के माध्यम से, और अनेक जगह प्रभु श्री राम की दिव्या लीलाओं का मंचन किया जाता है. तरीका चाहे जो भी हो, सबका उद्देश्य तो केवल आनंद की प्राप्ति होता है. हमारे देश में वैसे तो माँ वैष्णो के अनेकानेक भक्त हुए हैं जिनकी कथाएँ हम सब सुनते ही है, इनमे प्रमुख थे श्री ध्यानु जी महाराज जिनके समक्ष स्वयं अकबर भी नतमस्तक हो गया था और इस बात का प्रत्याख प्रमाण वेह छत्र है जो आज भी माँ ज्वाला के मंदिर में रखा हुआ है. परन्तु एक ऐसे शख्स हमारे बीच में आज भी उपस्थित हैं जिनके सिर पर माँ ने अपनी कृपा और करुणा का वरद हस्त रखा हुआ है. जिनकी आवाज़ हमारे घरों में, हमारे दिलों में हमेशा गूंजती रहती है, जिन्होंने अनेक भक्तों को माँ से जोड़ा है और संगीत के माध्यम से जो कई वर्षों से माँ के नाम का प्रचार निरंतर कर रहे हैं, जी हाँ, मै बात कर रहा हूँ, माँ के लाडले परम आदरणीय श्री नरेन्द्र चंचल जी की जिनकी भेंट चन्द्रमा की चांदनी से भी अधिक शीतल और सुखदायी होती हैं. मै यहाँ उनकी कुछ भेंट आप सबको उपलब्ध करा रहा हूँ और आप इन्टरनेट पर इनके अनगिनत भजनों को सुन सकते हैं. 


अंत में इसी प्रार्थना के साथ अपनी कलम को विश्राम देता हूँ कि माता राणी आप सब पे अपनी कृपा बरसाती रहे और यह नवरात्रि आपके लिए मंगलमय हों. 

श्री राधे ~~~~~ जय माता दी ~~~~~ श्री राधे 

Tuesday, October 2, 2012

आगामी कार्यक्रम

कथा व्यास


श्रधेय आ० गो० श्री मृदुल कृष्ण शास्त्री जी महाराज

04 अक्टूबर से 10 अक्टूबर : दिलशाद गार्डन, नई दिल्ली 

16 अक्टूबर से 22 अक्टूबर : नौखा, बीकानेर, राजस्थान 

1 नवम्बर से 7 नवम्बर : प्रभु टाउन, रायबरेली, उत्तर प्रदेश 

इन सभी कथाओं का सीधा उया विशेष प्रसारण केवल अध्यात्म चैनल पर देखा जा सकता है। प्रसारण के विषय पर जानकारी आपको हमारी तरफ से समय समय पर मिलती रहेगी 

.. प्रेम से कहिये श्री राधे .. 

Friday, September 28, 2012

Laadali Adbhut Nazara Tere Barsane Mai Hai...!!


Barsana , one of the most stunning place of our Brij Dham,  is famous for divine love of Goddess, Radha Rani.  The religious values of Barsana make it different from other religious destinations.

Luckily with the grace of radha rani, on this radha asatami  we are able to visit this beautiful place, it was an awsome experince to be in barsana on radha astami, can'nt describe in word, how much we enjoyed their,here  is some of pics that, we had taken during our visit.






I feel extremely blessed to have opportunity to  attended a wonderful bhajan  sandhya, by shri Govind Bhargav ji, at Shriji Mahal. He is really a fantastic singer and down to earth person.


Here is few awesome, mind blowing  bhajans  sungs by Bhargav, as usual in his stunning voice, can be downloaded from given, links.

Please leave comment, if you like or if facing any  problem in downloading bhajans or thought , experiences which you would like to shares.

Bolo jai jai shri radhe.

1. Ladali adbhut nazara tere barsane mai hai:   TO DOWNLOAD CLICK HERE

2. Kanhaya le chal parli paar : TO DOWNLOAD CLICK HERE

3. Mai to sooy rahi sapne mai : TO DOWNLOAD CLICK HERE

4. Karte ho tum kanihya : TO DOWNLOAD CLICK HERE



--radhe------radhe--------radhe---------radhe-------radhe----radhe--------radhe-


Friday, September 21, 2012

राधाष्टमी एवं स्वामी श्री हरिदास जयंती

किशोरी सुंदर श्यामा, तू ही सरकार मेरी है 
नहीं है औरन से मतलब, मुझे एक आस तेरी है
किशोरी सुंदर श्यामा मुझे विपदा ने घेरी है
दर्श दे के कृपा कीजो, फ़िर काहे की देरी है
टहल बक्शो महल निज को, विनय कर जोर मेरी है
सरस यह माधुरी दासी, तेरे चरणों की चेरी है

परम आदरणीय भक्तजनों, कथा प्रेमियों, भजन रसिकों एवं प्रिय पाठकों, आप सबको इस नाचीज़ की तरफ से "जय श्री राधे". आज यह लेख लिखते हुए मुझे बेहद खुशी हो रही है परन्तु साथ ही मेरे हाथ भी काँप रहे हैं क्योंकि आज मै उनके विषय में लिखने जा रहा हूँ जो अनंत कोटि ब्रह्माण्ड नायक, आनंद निकुंजेश्वर श्री बांके बिहारी की भी परम अह्लाद्नी शक्ति हैं. जी हाँ, आज मै हम सबकी प्यारी, बरसाने वारी श्री राधा राणी के बारे में लिखने का दुस्साहस करूँगा. 

इस धरती पर जितने वृक्ष हैं, यदि उन सबकी कलम बना दी जाये, जीता समुद्र में जल है, यदि उतनी स्याही बना दी जाये और जितनी जगह इस धरती पर है, उस सब को कागज़ बना दिया जाए तो भी गुरु की महिमा, और किशोरी जी के रूप का वर्णन नहीं लिखा जा सकता. वेद भी जिन्हें 'नेति, नेति' कहकर पीछे हट जाते हैं, उनके विषय भला हम तुच्छ मानव क्या लिखें. 'नेति' का अर्थ होता है 'न इतिः सः नेति' अर्थार्थ जिसका कोई अंत नहीं है वह हैं मेरी राधे जू. बंधुओ, मेरी प्यारी का रूप तो ऐसा है कि जब वो बिना परदे के घर से बाहर निकले, तो चंद भी शर्मा के बादलों के पीछे छुप जाता है. उनकी महिमा इतनी विशाल है कि स्वयं ठाकुर भी सेवा कुञ्ज में उनके चरण दबाते हैं. आप सब जानते हैं कि हमारे वृन्दावन धाम की क्या महिमा है, तो ज़रा सोचो जिन्होंने वृन्दावन को अपनी राजधानी बनाया है उनकी महिमा क्या होगी. ब्रज मंडल कि लता-पता, वह के मोर-बन्दर और यहाँ तक की यमुना जी भी राधे नाम का ही जाप करती हैं 
ब्रज मंडल के कण कण में, प्यार बसी तेरी ठकुराई 
कालिंदी की लहर लहर ने, बस तेरी महिमा गाई 

और आप ब्रज के किसी भी मंदिर में जाके देख लो, भक्त जान आपको राधे नाम की मस्ती में ही झूमते हुए मिलेंगे, इतना नशा तो किसी मैखाने में नहीं होता जितना नशा हमारे वृन्दावन के मंदिरों में है. लोग नज़रों से पीते है वहाँ पर और उनके सिर पर नशा भी ऐसा होता है जो किसी भी प्रयास से उतरने वाला नहीं है. अंगूरी शराब पीने वाला तो अपनी जेब का ख्याल करते हुए कुछ देर बाद पीना छोड़ देगा पर ये राधा नाम का जाम ऐसा है प्रेमी भक्तजनों कि इसके सामने कोई अपनी जेब का ख्याल नहीं करता, यहाँ तो जान भी गिरवी रख देते हैं, बस कोई राधे नाम कि मस्ती पीला दे
न गुलफाम चाहिए, न सलाम चाहिए
न मुबारक का कोई पैगाम चाहिए
जिसको पीकर होश उड़ जाएँ मेरे
मुझे राधे नाम का ऐसा जाम चाहिए 

इसी कारण से मै यह लेख लिखते हुए घबरा रहा था, मै शुरुआत की किशोरी जी के रूप से और उनके नाम पर पहुँच गया. द्वापर में एक बार सूर्य ग्रहण का पर्व पड़ा और भगवान कृष्ण अपनी सभी रानियों-पटरानियों के साथ द्वारिका से कुरुक्षेत्र पधारे थे और इधर ब्रज से सभी ब्रजवासी भी उसी समय कुरुक्षेत्र स्नान करने आये और साथ में राधा रानी भी आई थीं. रुक्मणि आदि रानियों का बहुत पहले से ही मन था कि वो किशोरी जी के दर्शन करें और आज इतना अच्छा अवसर अपने सामने देख उनसे रुका न गया. वो किशोरी जी के निवास स्थान के पास जाके खड़ी हो गयीं और प्रतीक्षा करने लगी कि कब राधे जू बाहर निकलेगी. उसी वक्त एक परम सुन्दरी अंदर से आई और उसके मुख पर करोड़ों सूर्यों का तेज था और लाखों चन्द्रमा की शीतलता. सभी रानिया उनके चरणों में गिर पड़ी तो उस स्त्री ने उन्हें उठाया और इस सम्मान का कारण पूछा. तो रुक्मणि जी ने बताया कि हम सब आपके प्रेमी कृष्ण की रानियाँ हैं और उन्होंने हमारे समक्ष आपकी और आपके रूप की बहुत तारीफ की थी पर हमें लगता है कि स्वामी ने जो भी कहा था कम ही कहा था, आपकी महिमा तो उससे बहुत अधिक है जितना हमें बताया गया. तो आप यकीं नहीं करोगे कि उस स्त्री ने क्या जवाब दिया, वो स्त्री बोली कि आप लोग मुझे गलत समझ रहे हो, मै राधा नहीं हूँ मै तो राधा की दासी की भी दासी हूँ. ज़रा सोचिये जिनकी दासी कि भी दासी का रूप ऐसा है तो उन किशोरी जी का रूप कैसा होगा. 

श्रीमद भागवत जैसे विशाल ग्रन्थ में कहीं भी हमारी राधे का नाम नहीं है. मै इस तथ्य के कारण में तो नहीं जाऊँगा पर आपको इतना ज़रूर बता दूँ की भागवत में भले ही राधे जू का नाम न हो पर ये ग्रन्थ केवल राधा नाम पर ही टिका है. मुझे बहुत लोग ऐसे मिले जो इस बात को अन्यथा अर्थ से समझते हैं. जब लोग ये बात सुनते हैं की भागवत में राधे जू का नाम नहीं है तो बहुत गलत विचार उनके मन में आ जाते हैं. मुझे खुद ऐसे कुछ लोग मिले जो उनपर शक करने लगे थे और उन्होंने कुछ एसी बात मुझे बोली जिसका ज़िक्र मुझे करते हुए भी शर्म आती है. तो मै आप सब से विनती करूँगा कि आप कोई भी ऐसा विचार अपने हृदय में न लाये क्योंकि जू ये सोचते हैं कि हमें राधा से क्या मतलब हम तो कृष्ण को अपना बनायेंगे तो ये बात भी समझ लो की बिना श्री जी की कृपा के, बांके बिहारी का मिल पाना असंभव है. इसलिए बिना किसी शंका के मेरी किशोरी का नाम गाओ क्योंकि कलिकाल में भगवान तक पहुँचने का एक मात्र साधन नाम है. 
मेरी राधे के चरणों में यदि तेरा प्यार हो जाता
तो इस भव से तेरा भी बेड़ा पार हो जाता
पकड़ लेता चरण गर तू मेरी राधा राणी के
तो पागल तुझे मेरे श्याम का दीदार हो जाता

अब ज़रा मुख्य बात पर आते हैं, जिनकी बहुत अल्प चर्चा मैंने अभी की, वो राधा राणी इस धरती पे प्रकट कब हुई. भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी को तो मेरे बांके बिहारी आये थे और उनके पांच वर्ष पूर्व, भाद्रपद शुक्ल पक्ष अष्टमी को गोकुल के निकट रावल गाँव में वृषभानु के यहाँ किशोरी जी का जन्म हुआ और इस पवित्र दिवस को राधाष्टमी के नाम से जाना जाता है. इस वर्ष राधाष्टमी का पर्व २३ सितम्बर को बरसाने में बड़े धूम धाम के साथ मनाया जायेगा, जिनको किशोरी जी अपने धाम में बुलाएँ वो तो परम सौभाग्यशाली होंगे ही पर यदि आप बरसाना न भी जा पो तो अपने घर पे ही किशोरी जी को 'हैप्पी बर्थडे' ज़रूर बोलना. 

केवल किशोरी जी का ही नहीं, हमारे अन्य रसिक नृपति परम श्रधेय स्वामी श्री हरिदास जी महाराज का प्रादुर्भाव भी इसी दिन हुआ था. इसलिए हमारे वृन्दावन में हरिदास जी का बधाई उत्सव मनाया जाता है. लगभग एक सप्ताह पूर्व ही बधाई उत्सव प्रारंभ हो जाता है और राधाष्टमी के दिन संध्या काल में श्री बिहारी जी कि सवारी निधिवन राज पधारती है और गोस्वामी वर्ग, समाज गायन करते हुए चाव की सवारी के साथ हरिदास जी महाराज को बधाई देने के लिए आते है. इस दिन वृन्दावन में कई सांकृतिक कार्यकर्म औ स्पर्धाओं का आयोजन होता है. हमारे पूज्य गुरुदेव के सानिध्य में भी श्री राधा स्नेह बिहारी मंदिर में कला रत्न सम्मान का आयोजन होता है जिसमे बहुत से कलाकार भाग लेते हैं और अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं. 

मन तो यही है कि अपनी कलम को राधे जू और हरिदास जी की प्रशंसा में इसी प्रकार चलता रहूँ पर मुझे इस लेख कि मर्यादा और आपकी सहन-शक्ति दोनों का ही ख्याल रखना है, मै जानता हूँ आप सब इससे अधिक मेरे शब्दों को नहीं झेल पाएंगे. इसलिए अंत में मै आप सबकी तरफ से राधे जू और स्वामी जी को जन्मदिन कि बधाई देना चाहता हूँ और उनसे यह विनती करना चाहता हूँ कि अपनी करुणामयी नज़र इसी प्रकार बनाये रखें. 

बांकी रसिक बिहारिणी राधे
बांके रसिक बिहारी
बांका मुकुट चन्द्रिका बांकी,
बांकी चितवन प्यारी
बांकी चाल चारु मति चंचल
पग नुपुर झनकारी
सरस माधुरी बांकी झांकी
ये तो जीवन प्राण हमारी 

श्री राधे~~राह दे~~श्री हरिदास~~राह दे~~श्री राधे 

Saturday, September 8, 2012

चातुर्मास : व्रत, भक्ति और शुभ कर्म के चार महीने

सभी भक्तों को मेरी ओर से जय श्री राधे. अपने पिछले लेख में मैंने आप सबको पुरुषोत्तम मास के विषय में जानकारी देने का प्रयास किया था और आज मै चातुर्मास के विषय में कुछ लिखना चाहता हूँ. 

चातुर्मास ४ महीने कि अवधि है जो आषाढ़ शुक्ल एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक मनाया जाता है. इस अवधि में ज्ञानयोगी, कर्मयोगी और प्रेमी भक्तजन सभी कुछ नियमों का पालन करते हैं और अपनी श्रद्धानुसार उपवास भी रखते हैं. इस दौरान फर्श पर सोना बहुत शुभ माना जाता है. मौन व्रत धारण करना और अपना अधिकतम समय श्री हरी विष्णु की सेवा में व्यतीत करना भी बहुत फलदायी होता है. हमारे शास्त्रों के अनुसार भगवान चातुर्मास में योग निद्रा में विश्राम करते हैं. अतः इस अवधि में सभी शुभ कर्म जैसे विवाह संस्कार, जातकर्म संस्कार, गृह प्रवेश आदि निषेध माने जाते हैं. 

पौराणिक कथा कुछ इस प्रकार है:
एक बार असुरराज विरोचन के पुत्र बाली ने अश्वमेघ यज्ञ करके बहुत पुण्य अर्जित कर लिया और सभी दैत्य देवताओं से उच्च श्रेणी में पहुच गए  और इन्द्र से उनका सिंघासन छीन लिया गया. इन्द्र सभी देवताओं सही भगवन नारायण की शरण में गए और भक्तवत्सल भगवान ने उन्हें वचन दिया कि कि वो उनकी सहायता करेंगे. प्रभु ने एक छोटे से बालक का वामन अवतार धारण किया और साथ में शिवजी ने भी बाल रूप धरा और बटुक भैरव के नाम से विख्यात हुए. वामन भगवान राजा बलि के द्वार पर पहुंचे और उनसे तीन पग भूमि का दान माँगा. यह कथा हम सबने पूज्य गुरुदेव के श्री मुख से सुनी है. तो भगवान ने अपना तीसरा चरण राजा बलि के सिर पे रखा तो उसे नर्क में प्रभु ने धकेल दिया और पाताल लोक का राज्य भी दे दिया. बलि की सच्चाई से प्रसन्न होकर वामन भगवान ने उसे एक वर मांगने को कहा तो राजा बलि ने ठाकुर जी से यह विनती की कि वो माँ लक्ष्मी सहित उनके साथ साल के तीसरे हिस्से के लिए रहें अर्थार्थ प्रभु को अपनी वामंगिनी सहित एक तिहाई साल के लिए (४ महीने) राजा बलि के साथ रहना था. प्रभु ने उसकी मनोकामना पूर्ण की और इसी चातुर्मास में प्रभु राजा बलि के साथ पाताल लोक में निवास करते हैं. इसलिए चातुर्मास के प्रारंभ को देवशयनी एकादशी कहा जाता है और अंत को देवोत्थान एकादशी. 

शास्त्रों में चातुर्मास व्रत के लिए कोई नियम आदि नहीं बताये गए हैं, यह तो श्रद्धालु की अपनी श्रद्धा है कि वो किस प्रकार अपने इष्ट को रिझाना चाहता है परन्तु कुछ भक्त बहुत कठिन नियमों के साथ इस व्रत का पालन करते हैं. कुछ नियम मै नीचे बताने का प्रयास कर रहा हूँ. 
सूर्योदय से पहले उठना, ब्रह्म बेला में स्नान और तत्पश्चात भगवान की पूजा. इस व्रत में दूध, शक्कर, दही, तेल, बैंगन, पत्तेदार सब्जियां, नमकीन या मसालेदार भोजन, मिठाई, मास और मदिरा का सेवन नहीं किया जाता. कुछ भक्त अलग अलग महीनो में अलग अलग नियमों से व्रत रखते हैं. 

श्रावण : पत्तेदार सब्जियां यथा पालक, साग इत्यादि 
भाद्रपद : दही 
अश्विन : दूध
कार्तिक : प्याज, लहसुन और उरद की दाल


चातुर्मास में परभी कि कथा सुनने का विशेष महत्व है. इसलिए मेरा आग्रह है कि आप सब अध्यात्म चैनल के माध्यम से पूज्य गुरुदेव के श्रीमुख से कथा का अमृत पान ज़रूर करें और अपने जीवन को धन धन्य बनाकर कृतार्थ करें. जो नियम मैंने ऊपर बताये, उनका पालन करना एक गृहस्थ के लिए कठिन होता है. इसलिए हम अपनी सहूलियत के अनुसार कोई भी एक नियम मानकर व्रत रख सकते हैं. कुछ नियम और उनके फल मैं नीचे लिख रहा हूँ. 

  1. नमक का परहेज़ : हमारी आवाज़ को मधुरता प्रदान करता है
  2. तेल से परहेज़ : लंबी उम्र 
  3. कच्चे फल और सब्जियों से परहेज़ : शुद्धता प्रदान करता है
  4. सुपारी से परहेज़ : खुशहाली प्रदान करता है 
  5. दूध या दूध से निर्मित पदार्थों से परहेज़ : शांति प्रदान करता है
  6. शहद से परहेज़ : जीवन में चमक प्रदान करता है
  7. मदिरा से परहेज़ : अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करता है
  8. गरम भोजन से परहेज़ : हमारी संतान को दीर्घायु बनाता है
  9. फर्श पर विश्राम : भगवान विष्णु कि कृपा प्रदान करता है
  10. मासाहार से परहेज़ : योगिओं और मुनियों की गति प्रदान करता है
  11. दिन में केवल एक बार भोजन : अग्निहोत्र के परिणाम प्रदान करता है
  12. केवल दोपहर का भोजन : देवलोक में प्रवेश प्रदान करता है
  13. केवल रात्रि में भोजन : तीर्थ यात्रा का आनंद प्रदान करता है
  14. प्रभु के चरण कमल का स्पर्श : उन्नति प्रदान करता है
  15. प्रभु के मंदिर की सफाई : अच्छा घर प्रदान करता है
  16. मंदिर की परिक्रमा : मोक्ष प्रदान करता है
  17. मंदिर में गायन : गन्धर्वलोक में प्रवेश प्रदान करता है
  18. शास्त्रों का अध्यन : विष्णुलोक में प्रवेश प्रदान करता है
  19. मंदिर में जल का छिडकाव : अप्सरालोक में प्रवेश प्रदान करता है
  20. विष्णु जी कि पूजा : वैकुंठ में निवास प्रदान करता है
  21. फर्श पर बिना बर्तन के भोजन करना : शक्ति प्रदान करता है
  22. रोजाना स्नान : स्वर्ग प्रदान करता है
  23. कोई अपशब्द न कहना : समाज में उच्च स्थान प्रदान करता है
आशा करता हूँ आप सबको इस लेख के माध्यम से कुछ नयी जानकारी प्राप्त हुई होगी. यदि आपको मेरे लिखने में कोई त्रुटी महसूस होती है तो आपके सुझाव आमंत्रित हैं. मुझे बेहद खुशी होगी यदि आप मुझे मेरी गलतियों को सुधारने का मौका दें. अगले लेख में एक बार फ़िर मै आपके साथ रूबरू होऊंगा भगवन श्री कृष्ण और राधा राणी की एक मनमोहक लीला के साथ. 

जय श्री राधे