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Monday, August 20, 2012

पुरुषोत्तम मास

सांवल-गौर सरकार के युगल चरणों में मेरा कोटि कोटि प्रणाम, गुरु जी को सस्नेह वंदन और आप सब भक्तों को भी मेरी ओर से प्यार भरी राधे राधे. ठाकुर जी कि प्रेरणा से आज एक बार फ़िर अपनी कलम से कुछ लिखने का प्रयास कर रहा हूँ और आपको पुरुषोत्तम मास के विषय में कुछ बताना चाहूँगा. हम सबने श्रीमद्भागवत को पढ़ा या सुना ज़रूर है. इस परम ग्रन्थ के छटे स्कंध में १५ अध्याय हैं जीने में प्रथम के पांच अध्यायों में हिरण्यकश्यप की कथा है, मध्य के पांच अध्यायों में भक्त प्रहलाद का चरित्र आया है और अंतिम पांच अध्यायों को कर्म पंचाध्यायी कहा जाता है. हिरण्यकश्यप ने एक बार ब्रह्मा जी का कठोर तप करके कुछ ऐसे वरदान हासिल कर लिए, जिससे उसकी मृत्यु लगभग नामुमकिन हो गयी. उसका आतंक बहुत अधिक फ़ैल गया. उस राक्षस ने ब्रह्मा जी से एक वरदान ये भी माँगा था कि में साल के बारह महीनो में से किसी भी महीने में ना मरुँ. जब भगवान नरसिंह उस दुष्ट का संहार करने पधारे थे, तो उन्होंने उसे कहा था कि मै तुझे साल के १२ महीनो में नहीं मार सकता, इसलिए तेरे लिए मै एक तेरहवा महीना बनाता हूँ, पुरुषोत्तम मास. 

शनिवार १८ अगस्त से यह पवित्र पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हो चुका है और इस वर्ष हमें इसका सानिध्य भाद्रपद के महीने में मिला है. यह बहुत ही उल्लास की बात है क्यूंकि श्रावण और भाद्रपद सबसे खुशहाल महीने माने जाते हैं और उनमे यदि पुरुषोत्तम मास भी मिल जाये तो कहने ही क्या. शुद्ध भाद्रपद के कृष्ण पक्ष के उपरान्त अब अधिक मास का शुक्ल पक्ष चल रहा है, फ़िर अधिक भाद्रपद का कृष्ण पक्ष और तत्पश्चात शुद्ध भाद्रपद का शुक्ल पक्ष आयेगा. पुरुषोत्तम मास केवल ऐसा महीना है जिसका शुक्ल पक्ष, कृष्ण पक्ष से पूर्व आता है. ये मास हर तीसरे साल में आता है और विभिन्न क्षेत्रों में इसे अलग अलग नामों से जाना जाता है. उदहारण के लिए: मल मास, अधिमास, मलिमलुच, संसारपा और अहम्सपति मास. इस महीने में कोई सूर्य-संक्रांति नहीं होती. हमारी संस्कृति में इस महीने का विशेष महत्व है और केवल संस्कृति ही नहीं, विज्ञान की दृष्टि से भी यह महीना बहुत आवश्यक है. हाम मानते हैं कि पृथ्वी ३६५ दिनों में सूर्य के इर्द गिर्द आपना एक चक्कर पूरा करती है, परन्तु यदि बारीकी से देखे तो यह अवधि कुछ घंटे कम होती है और उसको पूरा करने के लिए ही अधिक मास हमारे कैलेंडर से जोड़ा गया. 

इस महीने में शादी, गृह-प्रवेश, मुंडन इत्यादि शुभ कार्य निषेध होते हैं परन्तु धार्मिक अनुष्ठान जैसे हवन, भगवत महायज्ञ, दान आदि बहुत फलदायक होते हैं. जो शुद्ध ह्रदय से और पूर्ण भक्ति भाव से यह कार्य करता है, उसे अपनी पूजा-अर्चना का विशेष लाभ प्राप्त होता है. इस अधिक मास का वर्णन ऋग्वेद, अथर्ववेद, भागवत पुराण एवं और भी कई प्रामाणिक ग्रंथो में आया है. भागवत जी में लिखा है कि जो भक्त किसी धार्मिक नदी या कुंद में स्नान इस महीने में करता है, उसके सारे संताप प्रभु खुद हर लेते हैं. धन और शांति पाने के लिए इस महीने में श्रीमद्भागवतगीता  का पथ करना चाहिए और प्रभु श्री कृष्ण और श्री हरी विष्णु के कथाओं को पढ़ना या सुनना चाहिए. हमें फर्श पर सोना चाहिए, दिन में एक बार भोजन लेना चाहिए और किसी भी प्रकार की पितृ-पूजा या तर्पण नहीं करना चाहिए. 

कथा कुछ ऐसी भी पढ़ने को मिलती है कि एक बार यह अधिक मास क्षीर सागर में नारायण भगवान से मिलने गया और उनसे विनती करने लगा कि मुझे भी एक देवता दो. जैसे हर मास का, हर नक्षत्र का, और हर दिन का एक देवता होता है, ऐसे अधिक मास का कोई देवता नहीं था. तो उसकी करूँ पुकार पर मेरी दयालु सरकार ने उसे अपना ही एक नाम दे दिया, 'पुरुषोत्तम' और वो स्वयं इस अधिक मास के देवता बन गए. हमारी उन्ही के चरणों में यह विनती है कि वो हर जगह खुशी बनाये रखें और अपने भक्तों पर कोई विपदा न आने दे. 


  

Wednesday, August 8, 2012

श्री कृष्ण जन्माष्टमी


हर शाम चरागों से जला रखी है
बात ये दुनिया से छुपा रखी है
न जाने किस गली से आजाओ तुम
इसलिए हर गली फूलों से सजा रखी है



जब इस पृथ्वी पर पाप और अत्याचार बहुत अधिक बढ़ गया तो माँ धरती ने सभी देवताओं के साथ मिलकर नारायण के समक्ष अपनी व्यथा गाई और श्री हरी विष्णु ने उन सबको यह आश्वासन दिया कि वो बहुत जल्द कृष्ण अवतार धारण करके पृथ्वी पर आएंगे. सुंदर भाद्रपद का महीना और कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, अभिजित मुहूर्त और रोहिणी नक्षत्र का तीसरा चरण, बादलों की गडगडाहट और मंद मंद पवन मानो प्रभु का स्वागत कर रहे हों और सभी देवताओं ने प्रभु की गर्भ स्तुति की जब उन्होंने मथुरा में, कंस के कारागार में, माँ देवकी के गर्भ से चतुर्भुज रूप से अवतार लिया. यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि प्रभु ने अवतार लिया, उन्होंने जन्म नहीं लिया क्यूंकि प्रभु तो अजर अमर हैं. उन्होंने गीता जी में अर्जुन को उपदेश देते समय यह बताया है कि वो न तो जन्म लेते हैं और न ही मरते है, वो तो हर पल, हर क्षण, इस प्रकृति और इस ब्रह्माण्ड के कण कण में व्याप्त हैं. पुष्पों में सुगंध के माध्यम से, हवा में शीतलता के माध्यम से, धूप में तपिश के माध्यम से, चाँद में चांदनी के माध्यम से, सूर्य में प्रकाश के माध्यम से, खेतों में लह्लाहट के माध्यम से और सभी जीवों के आत्मा के माध्यम से प्रभु विराजते हैं. जैसा कि श्री राम चरित मानस में शिव जी बताते हैं, 

हरी व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेम ते प्रगट भये मै जाना

तो सवाल यह सामने आता है कि यदि प्रभु सर्व व्यापक हैं तो उन्हें तरह तरह के शरीर धारण करने की क्या आवश्यकता है. कई लोग इस बात का उत्तर ये देते हैं कि प्रभु असुरों के विनाश के लिए आते हैं. परन्तु यह बात सत्य नहीं है बंधुओ. क्यूंकि हमारे प्रभु तो इतने महान हैं कि यदि उनकी एक भृकुटी टेड़ी हो जाए तो काल स्वयं थर थर कांपने लगता है तो क्या वो प्रभु अपने लोक में बैठे बैठे मुठ्ठी भर असुरों का विनाश नहीं कर सकते ? इस सवाल का असली उत्तर भी भोले नाथ ने उपर्लिखित चौपाई में ही दिया है. शिव जी कहते हैं कि 'प्रेम ते प्रगट भये मै जाना'. अर्थार्थ प्रभु को प्रेम से जहाँ पुकारा जाये वो वहीँ अपने भक्तों के सामने प्रकट हो जाते हैं. इसलिए अपने भक्तों के साथ सुंदर सुंदर लीला करने के लिए, अपने बाल रूप का आनंद देने के लिए, अपने प्रेमियों का प्यार पाने के लिए ही प्रभु वृन्दावन में पधारे थे. एक प्रसंग मुझे स्मरण हुआ, इस लेख की सीमाओ को तोड़ के तो मै उस प्रसंग का वर्णन नहीं कर सकता, परन्तु फ़िर भी सांकेतिक तौर पे मै उस प्रसंग कि चर्चा करना चाहता हूँ. एक संत निर्गुण के बहुत बड़े उपासक थे. हमेशा कहा करते थे "घट में गंगा, घट में यमुना", क्या फायदा है मूर्ति कि पूजा करके या सगुण की उपासना करके, प्रभु सब जगह हैं इसलिए भगवान को एक निराकार तेज मानो. जब एक गाँव के लोगों ने यह बात सुनी तो बहुत बुरा लगा कि हमें ठाकुर जी के विग्रह को देखने से रोकता है यह संत. तो एक गाँव के व्यक्ति ने धोके से उन्हें एक कमरे में बंद कर दिया और जब संत चिल्लाने लगे प्यास से, तो उस व्यक्ति ने कहा कि ऊपर दो घड़े रखे हैं, उन्ही में गंगा यमुना है, अपनी प्यास बुझालो. तो संत ने कहा कि हाँ वो सत्य है पर उससे प्यास नहीं बुझती, तो उस व्यक्ति ने भी कह दिया कि हम भी जानते हैं कि वो निर्गुण निराकार है, पर जब तक वो सगुण बनकर हमारे सामने नहीं आता, तो हम भक्तों की प्यास नहीं बुझती. इसलिए बंधुओ, भगवान तो भक्तों की प्यास बुझाने के लिए आते हैं मोर-मुकुट धारण करके.



तो अब सब भक्तों को अपनी कमर कास लेनी चाहिए. नहीं नहीं, किसी जंग या लड़ाई की तैयारी नहीं करनी है, पर जन्माष्टमी दस्तक दे चुकी है न, इसलिए तैयार तो होना पड़ेगा, उनका जन्मदिन है, कोई छोटी बात तो है नहीं. इसलिए आइये हम यह जाने कि यह पावन त्यौहार प्रभु की भूमि श्री धाम वृन्दावन में कैसे मनाया जाता है. वैसे तो इस वर्ष बड़ी सुंदर भागवत कथा चल ही रही है, पर श्री बांके बिहारी जी के साथ इस त्यौहार को कैसे मनाया जाता है आइये पढ़ें. 

एक बहुत ही अलग ढंग से यह पर्व वृन्दावन में मनाया जाता है और पूरे वर्ष में केवल इस दिन ठाकुर जी की मंगला आरती की जाती है. पूरे दिन साधारण रूप से दर्शन होते हैं, शयन आरती के पश्चात् रात में ठाकुर जी शयन को जाते हैं और उनके जन्मोपरांत मध्यरात्रि प्रभु का दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से अनुपम महा अभिषेक होता है और उसके बाद लगभग दो बजे उनके दर्शन खुलते हैं. पूरे वर्ष में केवल इस दिन ठाकुर जी इस विशेष बेला में भक्तों के सामने मुस्कुराते हैं और अपने जन्मदिन के उपलक्ष्य में उनकी छवि का वर्णन करना नामुमकिन है. महा अभिषेक कि सेवा दर्शनों के लिए नहीं होती और इस दौरान मंदिर के प्रांगन में श्रीमद भगवत कथा का विशेष आयोजन किया जाता है. वह दशम स्कंध के अंतर्गत कृष्ण जन्म कथा का पाठ किया जाता है. फ़िर लगभग ३:३० पे उनकी मंगला आरती की जाती है और प्रातः छः बजे तक उनके दर्शन खुले रहते हैं. महा अभिषेक का चरणामृत प्रसाद के रूप में भक्तों में वितरित किया जाता है और प्रभु के जन्मदिन के उपलक्ष्य में दूध, नारियल और मेवा से निर्मित स्वादिष्ट पकवान भोग लगाकर भक्तों को दिए जाते हैं. इस दिन ठाकुर जी अपने कक्ष को छोड़ कर जगमोहन में आ जाते हैं और वहां स्वर्ण रजत के न्यारे सिंहासन पर विराजते हैं और रात भर अपनी टेढ़ी नज़रों के तीर से दीवानों को घायल करते हैं.

नशीली आँखों से जब वो हमें देखते हैं
हम घबराकर आँखे झुका लेते हैं
कौन मिलाये उन आँखों से आंखे
सुना है वो नज़रों से दिल चुरा लेते हैं

जन्माष्टमी के एक दिन पश्चात्, अर्थार्थ नवमी तिथि को वृन्दावन में नंदोत्सव मनाया जाता  है. मंदिर के गोस्वामी दर्शन करने आये भक्तों को मिठाई, फल, खिलोने, बर्तन, कपड़े इत्यादि बांटे जाते हैं. मंदिर में भक्तजन नन्द बाबा को बधाई देने के लिए भजन गाते हैं और लाला के जन्म कि खुशी में मस्ती से झूमते हैं. मंदिर में सब इतने मस्त होते हैं और सबको केवल अपनी ही आवाज़ सुनाई देती है, कोई किसी कि बात नहीं सुन सकता, बस सबका तार ठाकुर जी के श्री विग्रह से जुड़ा होता है. हर श्रधालु अपने ढंग से मज़े लूट रहा होता है, कोई गाता है, कोई नाचता है, कोई वंदन करता है, कोई प्रसाद उछालता है तो कोई उन्हें प्रसाद के रूप में बटोर लेता है. ऐसा लगता है मनो बहुत सारे पागलों की टोली मंदिर में झूम रही हो. और यह बात कोई मिथ्या नहीं है, वाहन सब पागल ही होते हैं और वृन्दावन में तो बुद्धि का काम ही नहीं होता. वाहन तो सब राधा नाम कि शराब ठाकुर जी कि नज़रों से पीते हैं और उस नशे में सब दुनिया को भूल कर मस्त हो जाते हैं. दोपहर को राज भोग आरती तक यह उत्सव मनाया जाता है.

जन्माष्टमी के इस पावन पर्व पर हमारी बाल कृष्ण के श्री चरणों में यह प्रार्थना है कि आप सबके जीवन में खुशहाली सदा बनी रहे और ठाकुर जी आपको अपनी मुस्कान से इसी प्रकार लुभाते रहें. आपका प्यार श्री जी के चरणों और अधिक विकसित हो और गुरूजी के आशीर्वाद का साया आपके सिर पे हमेशा बना रहे. इस पर्व पर हमारा उनसे यही विनम्र निवेदन है:

ब्रज धूलि प्राणों से प्यारी लगे
ब्रज मंडल में ही बसाये रहो
रसिकों के सुसंग में ही मस्त रहूँ
जग जाल से नाथ बचाए रहो
नित बांकी झांकी निहारा करूँ
छवि झांक से नाथ बचाए रहो
अहो! बांके बिहारी यही विनती
मेरे नैनो से नैना मिलाये रहो




वृन्दावन धाम में आनंद भयो रे
यशोदा माँ को लाल कृष्ण चंद भयो रे


आप सबको और आपके परिवार को हमारी ओर से और पूज्य गुरुदेव की ओर से जन्माष्टमी कि बहुत बहुत बधाई. 

एक बार जोर से कहिये
~~~~~ राधे ~~~~~बधाई हो ~~~~~ राधे ~~~~~





Thursday, July 26, 2012

आगामी कार्यक्रम


परम पूज्य श्रद्धेय आ० गो० श्री मृदुल कृष्ण शास्त्री जी महाराज 

हम सबको इस बात का ज्ञान है कि हमारे पूज्य गुरुदेव की आवाज़ और उनकी कथा न केवल भारत में अपितु सात समंदर पार विदेशों में भी भक्तो का मार्गदर्शन करती है और उनको परम शांति का अनुभव कराती है. उनके कठिन परिश्रम के द्वारा और प्रभु श्री बांके बिहारी जी की कृपा से हमारे गुरूजी कि बुलंदिय केवल भारत की भूगौलिक सीमा में कैद नहीं हैं. वे विदेशों में भी उतने ही प्रिय और पूजनीय हैं जितने कि वो अपने देश में हैं. ये केवल एक तथ्य नहीं है, मै यह बात पूरे प्रमाण के साथ कहता हूँ. राधे जू की कृपा से हमारे इस ब्लॉग को एक सप्ताह में लगभग 5000 बार देखा जाता है और इनमे से 16 प्रतिशत विदेश के भक्त हमारे विचारों को पढते हैं. हमारे ब्लॉग के आंकड़े यह दिखाते हैं कि भारत के आलावा यह ब्लॉग अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, पोलैंड, कनाडा, संयुक्त अरब राष्ट्र, नेपाल और जेर्मनी में हर सप्ताह पढ़ा जाता है जो इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि इन सभी देशो में गुरूजी के चाहने वाले निवास करते हैं. इसलिए हर वर्ष पूज्य गुरुदेव कुछ समय के लिए विदेश यात्रा पर जाते हैं और वहां के भक्तों को हमारे वृन्दावन की एक झलक दिखाते हैं. मुझे यह जानकार कोई आश्चर्य नहीं होता की पूज्य गुरुदेव और उनके शिष्य मिलकर अमेरिका में भी ठाकुर जी को राधा राणी के साथ प्रकट कर देते हैं. इस वर्ष पूज्य गुरुदेव 05 अगस्त से 30 सितम्बर तक अमेरिका में कथामृत का वितरण करेंगे. वहां पर आयिजित उनकी सभी कथाओं का विवरण नीचे दिया जा रहा है:

  1. 05 August to 12 August : Riverside, USA
  2. 17 August to 23 August : Toronto, Canada
  3. 25 August to 31 August : Los Angeles, USA
  4. 02 September to 08 September : Edmenton, USA
  5. 10 September to 16 September : Washington, USA
  6. 17 September to 23 September :  Houston, USA
  7. 24 September to 30 September : New Jersey, USA

विशेष कार्यक्रम


इस वर्ष जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री भगवत मिशन ट्रस्ट के तत्वाधान में अष्टोत्तरशत (१०८) श्रीमद भागवत कथा का विशाल आयोजन किया जा रहा है. 

कथा व्यास : श्रद्धेय आ० श्री गौरव कृष्ण गोस्वामी जी महाराज
कथा स्थल : ठा० श्री राधा स्नेह बिहारी मंदिर/आश्रम
दिनांक : ०७ अगस्त से १३ अगस्त
समय : सायें ०३:०० बजे से ०७:०० बजे तक 

इस कथा के चतुर्थ दिवस की कथा जन्माष्टमी के पवित्र पर्व पर सुनाई जायेगी और मध्यरात्रि को ही बालकृष्ण  का जन्म पूज्य गुरुदेव अपनी मंगलमयी वाणी से करेंगे. साथ ही इस कथा का सीधा प्रसारण केवल अध्यात्म चैनल पर दिखाया जायेगा. सभी भक्तगण इस कथा को सुनकर अत्यंत दुर्लभ सौभाग्य का लाभ प्राप्त करें और ठाकुर जी के चरित्रों के श्रवण से अपने जीवन को कृतार्थ करें.  

Sunday, July 15, 2012

श्रावण मास

बरसाने सो उठी बदरिया, घिर गोकुल पर आई
यमुना भीगी, मधुबन भीगा, गोवर्धन पर छाई
ग्वाले भीगे, गैया भीगी, नन्द यशोमती माई
चीर भिगोये ब्रज लोगन के, कुञ्ज-कुञ्ज मुस्काई
कारी-कारी कामर ओढ़े, भीगे रसिक कन्हाई
मोर मुकुट, पीताम्बर भीगा, मुरली भी नहलाई 


हमारे शास्त्रों में भगवान ने कहा है कि मै महीनो में मार्गशीर्ष हूँ. अर्थार्थ भगवान की पूजा-अर्चना के लिए श्रेष्ठ महिमा मार्गशीर्ष है. परन्तु यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यदि प्रभु महीनो में मार्गशीर्ष हैं तो भक्त लोग महीने में श्रावण हैं. भक्ति और प्रेम का मौसम तो इसी श्रावण(सावन) के महीने में ही होता है. एक लंबी गर्मी के बाद बरसात का मौसम, त्योहारों का मौसम, प्यार का मौसम यह सब इसी सावन में महीने में होता है. इस महीने में तो वृन्दावन जाने का आनंद ही कुछ और होता है और ऊपर से यदि रिम-झिम पानी बरस जाये, तो कहने ही क्या. इस पूरे महीने में हमारे बांके बिहारी जी तो अद्भुत श्रृंगार करके ठाट से दर्शन देते हैं. चैत्र शुक्ल पक्ष एकादसी से हमारे वृन्दावन में ठाकुर जी के फूल बंगले सजने प्रारंभ हो जाते हैं. रोजाना शाम को प्रभु अपने कमरे से बाहर भक्तो के बीच जगमोहन में फूल बंगले में विराजते हैं. और सावन मास की अमावस्या (हरियाली अमावस्या) को ये फूल बंगले समाप्त ह्पो जाते हैं. इस वर्ष हरियाली अमावस्या वीरवर, १९ जुलाई को मनाई जायेगी. गत वर्ष मेरा यह बहुत बड़ा सौभाग्य था कि इस अमावस्या को मैंने वृन्दावन में ठाकुर जी के दर्शन किये थे. बंधुओ, फूल बंगले का वर्णन मै कैसे करू. मंदिर के पूरे प्रांगन में एसी मंद सुगंध बहती रहती है मनो हम किसी कल्पवृक्ष की छाया में खड़े हों. 

भगवान भोले नाथ की उपासना के लिए भी यह सावन का महीना सबसे उत्तम है. हम जानते है कि देश-देशांतर से श्रद्धालु हरिद्वार में एकत्र होते हैं और कांवड लाते हैं. गंगाजल का कलश भर अपने कंधो पे कांवड डाल, भक्त भोले कि मस्ती में पैदल हरिद्वार से अपने घर आते हैं. उन दीवानों को न तो पैर में छाले कि चिंता होती है और न ही किसी अन्य तकलीफ की. बस बाबा उन्हें हाथ पकड़ के खीच लेते हैं. शिव रात्रि की पवित्र बेला में यह जल शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है और उसके पश्चात् ही कांवड का व्रत पूरा होता है. इस वर्ष शिव रात्रि मंगलवार, १७ जुलाई को मनाई जायेगी. भगवान शिव की आराधना के कुछ सिद्ध मंत्र यहाँ दिए जा रहे हैं


कर्पूर गौरं करुनाव्तारम संसारसारं भुजगेन्द्र हारं
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि

देवदेव महादेव्नील्कंठ नमोस्तुऽते
कर्तुमिच्छाम्यहम देव शिवरात्रि व्रतं तव
तव प्रभावाद्वेवेश ! निर्विघ्नेन् भावोदती
कमाद्यः शत्रवो मां वै पीड़ाम कुर्वन्तु नैव हि 

रूपं देहि यशो देहि भोगं देहि च शंकर
भक्तिमुक्तिफलम देहि ग्रिहित्वार्घ्यम नमोस्तुऽते

दर्शनं बिल्व्पत्रस्य स्पर्शनं पापनाशनं
अघोरपापसंघारम बिल्व्पत्रम शिवार्पनम

नागेन्द्रहाराए त्रिलोचनाये भास्मंग्रगाये महेश्वराए
नित्यायेशुद्धाये दिगम्बराए तस्मै न कराये नमः शिवाये


शिवरात्रि के पश्चात् फ़िर हमारे वृन्दावन का एक बहुत बड़ा त्यौहार आता है. श्रावण शुक्ल त्रितीय जिसे हरियाली तीज भी कहा जाता है. इस दिन बांके बिहारी जी के बहुत विशेष दर्शन होते हैं. हरियाली तीज के पावन पर्व पर ठाकुर जी स्वर्ण हिंडोले में विराजते हैं. अनेक कीमती धातुओ से निर्मित इस हिंडोले का दर्शन वर्ष में केवल एक बार होता है. इस दिन मंदिर को एक बाग कि तरह सजाया जाता है. हर जगह हरी-हरी लाता पता शोभा पाती हैं. ठाकुर जी भी हरी पोषक हि पहनते हैं और उनकी सारी सखिया इस दिन उनके आस पास खड़ी हो जाती हैं. 

सावन के महीने के अंत में अर्थार्थ श्रावण पूर्णिमा को भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को मनाने का त्यौहार होता है जिसे कहते हैं रक्षा बंधन.

आप सब भक्तो को श्रावण मास की और उसमे आने वाले प्रत्येक त्यौहार की बहुत बहुत शुभकामना. जिस प्रकार से सावन के महीने में हर पेड़ फल-फूल जाता है, उसी प्रकार हम सबका परिवार, कारोबार, और प्रभु चरणों में प्यार फलता-फूलता रहे, ठाकुर जी के चरणों में यही मंगल कामना है और इसी प्रार्थना के साथ मै अपनी कलम को विश्राम देता हू. आप सबको जानकार खुशी होगी कि आपका मित्र अंशु गुप्ता अभी तक तो केवल लेख लिखता था, परन्तु इस बार आप सबके प्यार और विश्वास ने मुझे प्रेरित किया और मैंने सावन के महीने पर एक भजन भी ठाकुर जी को समर्पित किया है. मेरी सभी पाठकों से विनती है कि कृपया इस भजन को अपना कीमती समय दे और मुझे अपने सुझाव अवश्य लिखे. 

सावन का महीना, छाई घटा घनघोर
कदम् की डाल पे डाले, झूला झूले नन्द किशोर

ब्रज गलियन में यमुना किनारे, मोहन कांकरिया छुप-छुप के मरे
सब गोपिन की इसने, तो मटकी देई फोर
कदम कि डाल पे डाले झूला झूले नन्द किशोर              

डाट के देखो माँ ने मार के देखो, उखल ते मैया ने बांध के देखो
पर मान्यो न सांवरिया, चला न कोई जोर
कदम् की डाल पे डाले, झूला झूले नन्द किशोर

सावन की तीज आई झूले राधा प्यारी, प्यारी को झोटा देवे किशन मुरारी
हिंडोले पे देखो, कैसे मटके चित चोर
कदम् की डाल पे डाले, झूला झूले नन्द किशोर

फूलों के बंगले में विराजे है कनुआ, हंस हंस के मोह रह्यो भक्तों का मनुआ
दिल मेरा झूमे ऐसे, जैसे नाचे कोई मोर
कदम् की डाल पे डाले, झूला झूले नन्द किशोर

भव सागर में डोले दास की नैया, नैया संभालो कित खोये हो खिवैया
चरणों में अपने मोकू रखलो माखन चोर
कदम् की डाल पे डाले, झूला झूले नन्द किशोर


JAI SHRI RADHEY
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JAI BIHARI JI KI 




Tuesday, June 26, 2012

गुरु पूर्णिमा महोत्सव

कर्ता करे न कर सके पर गुरु किये सब होए
सात द्वीप नौ खंड में, गुरु से बड़ा न कोए
मै तो सात समुद्र की मसीह करूँ, और लिखने सब वन राय 
सब धरती कागज करूँ पर, गुरु गुण लिखा न जाये


सच बंधुओ, किसी ने बड़ा ही सुंदर कहा है कि "सात द्वीप नौ खंड में, गुरु से बड़ा न कोए". गुरु का स्थान हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है. हम संसारी जीवों कि बात ही क्या करें, जब स्वयं प्रभु रूप धारण करते हैं, चाहे वो राम रूप हो या श्याम रूप, उन्हें भी गुरु धारण करने ही पड़ते है. भगवान कहते हैं कि वो हर जगह व्यक्तिगत रूप से हाज़िर नहीं हो सकते, इसलिए उन्होंने गुरु को बनाया जो भक्तों का परमात्मा के साथ सम्बन्ध जोड़ सके. भक्त और भगवान इस भव सागर के दो किनारे हैं और इन दो किनारों को जोड़ने का काम गुरुदेव का होता है. हम ये बात बड़े ध्यान से समझे कि गुरु भगवन नहीं होते और जो ये कहे कि मै भगवन हूँ, वो गुरु भी नहीं है. पर ये बात भी सत्य है कि गुरु यदि इश्वर नहीं हैं तो वो व्यक्ति भी नहीं हैं, गुरु तो केवल परमात्मा कि अभिव्यक्ति हैं. प्रभु ने अपना प्रतिनिधि बनाकर गुरु को अपने भक्तों के बीच में भेजा है. 

जो बात दवा से बन न सकी, वो बात दुआ से होती है
होती है कृपा जब सद्गुरु की, तो बात खुदा से होती है


हमारे माता-पिता हमारे जीवन के आधार हैं. ये जीवन उन्ही कि देन है. हम चाह कर भी उनका यह क़र्ज़ नहीं अदा कर सकते. हमारे माता-पिता हमें संस्कार देते हैं, हमारे जीवन की रह दिखाते हैं परन्तु उस रह को रौशन गुरुदेव करते हैं. हमें मंजिल का परिचय को माता-पिता देते हैं, पर उस मंजिल तक हमारे सूत्रधार गुरुदेव होते हैं. इसलिए हमारे माता-पिता गुरु तुल्य हैं और गुरु माता-पिता तुल्य हैं. इन तीनो का स्थान कोई नहीं ले सकता. इनका जीवन में होना परम आवश्यक है. 

जनम के दाता मात-पिता हैं, आप कर्म के दाता हैं
आप मिलाते हैं इश्वर से, आप ही भाग्य विधाता हैं,
दुखिया मन को, रोगी तन को, मिलता है आराम आपके चरणों में
हे! गुरुदेव प्रणाम आपके चरणों में 

एक बात और बड़ी महत्वपूर्ण हमारे समझने योग्य है कि आज के कलयुग में गुरु को तो सब मानते हैं, पर गुरु की कोई नहीं मानता. सब यहो सोच कर खुश हो जाते हैं कि यदि हमने गुरुदेव के चरण पकड़ लिए, उनका आश्रय ले लिया तो हमारे ऊपर गुरु की कृपा हो गयी. परन्तु ऐसा नहीं होता. यदि कृपा होनी हो तो केवल आंख के इशारे में हो जाती है और यदि नहीं होनी हो तो चाहे पूरी जिंदगी चरण पकड़ के बैठे रहिये. और कृपा भी उसी पर होती है जो केवल गुरु को नहीं मानता, गुरु की भी मानता है. श्रद्धा और विश्वास का होना अत्यावश्यक है. इस विकत ज़माने में हमें बहुत से लोग मिलेंगे जो हमारे गुरु के बारे में गलत विचारधारा रखते हैं और वो हमें भी भटकाने का प्रयास करते हैं. वास्तव में वो कन्हैया के दूत होते हैं जो हमारी परीक्षा लेने आते हैं. हमें इस बात का ख्याल रखना है कि हम जिस गुरु को माने, पूर्ण समर्पण के साथ उनके हो जाएँ तभी गुरु आश्रय में सुकून और शांति का अनुभव हो सकेगा. और यह बात भी एक दम सच है, बल्कि ये कहूँ कि ये मेरी आप बीती बात है कि जिस दिन जीवन में गुरूजी का आगमन हो जाता है, उस दिन के बाद कामयाबी और खुशियाँ हमारे इर्द-गिर्द घूमती हैं. इसलिए कितना सुंदर कहा गया है

गुरुदेव के नाम से ये दुनिया चली है
गुरुदेव के रंग में ये दुनिया रंगी गई
और जिस शिष्य पे हो जाये गुरुदेव की कृपा
उसकी झोली फ़िर सदा खुशियों से भरी है

जैसा कि लेख के प्रारंभ में मैंने लिखा था कि गुरु गुण अनंत हैं और उनका बखान सरस्वती और सहस्त्र शेष नाग भी नहीं कर सकते और मुझ दीन के पास ऐसे शब्द कहाँ जो गुरूजी कि चर्चा कर सकें. हमारे गुरुदेव हमारे लिए बहुत कुछ करते हैं, तो उनका आभार प्रकट करने के लिए और उनका आशीर्वाद पाने के लिए संतों ने एक दिन निश्चित किया है. आषाढ पूर्णिमा, जिसे हम गुरु पूर्णिमा भी कहते हैं, गुरुदेव के सम्मान का दिन है. वैसे गुरुदेव का सम्मान हर पल होना चाहिए पर गुरु पूर्णिमा विशेष रूप से गुरुदेव को समर्पित एक शुभ तिथि है. इस वर्ष गुरु पूर्णिमा ३ जुलाई को मनाई जायेगी. 

गुरु पूर्णिमा का त्यौहार हमारे वृन्दावन में बड़े धूम धाम से मनाया जाता है. इस दिन हमारे अनन्य रसिक नृपति स्वम्क श्री हरिदास जी महाराज के अनुज श्री जगन्नाथ गोस्वामी जी का जन्मोत्सव भी होता है. पूरे वर्ष में केवल गुरु पूर्णिमा को श्री निधिवन राज में फूल बंगला बनाया जाता है. आप सबको जानकार बेहद खुशी होगी कि जगनाथ गोस्वामी जी के साथ साथ उन्ही के वंशज, हमारे पूज्य महाराज श्री, आचार्य गो० श्री मृदुल कृष्ण शास्त्री जी महाराज का शुभ आगमन भी इस दुनिया में गुरु पूर्णिमा के दिन ही हुआ था. 


इसी उपलक्ष्य में, हर साल कि भांति इस वर्ष भी जन्म दिवस एवं गुरु पूर्णिमा महोत्सव बड़े हर्षोल्लास के साथ राधा स्नेह बिहारी मंदिर वृन्दावन में मनाया जा रहा है. 

आचार्य श्रधेय मृदुल कृष्ण जी महाराज एवं श्रधेय गौरव कृष्ण जी महाराज  
के पावन सानिध्य में गुरु पूर्णिमा महोत्सव मंगलवार, ३ जुलाई, २०१२ को प्रातः ०९:०० बजे से मनाया जायेगा. 

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर पूज्य बड़े गुरुदेव एवं छोटे गुरुदेव जी के आशीर्वचन एवं सत्संग का लाभ भी प्राप्त होगा. आप सभी शिष्य एवं भक्त सपरिवार सादर आमंत्रित हैं. 

इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण केवल अध्यात्म चैनल पर

विशेष सूचना: जो शिष्य पूज्य गुरुदेव से दीक्षा मंत्र लेना चाहते हैं, वो २ जुलाई को प्रातः स्नेह बिहारी मंदिर में अपना नाम व पता देकर बुकिंग करा लें. दीक्षा केवल २ जुलाई को ही दी जायेगी, अतः सम्बंधित अधिकारीयों से जल्द से जल्द संपर्क करें. 

श्री कपिल चौधरी जी, श्री प्रिंस वर्मा जी और मै स्वयं अंशु गुप्ता, राधा राणी कि असीम कृपा से गुरु पूर्णिमा उत्सव में उपस्थित रहेंगे. किसी भी सहायता के लिए निसंकोच आप हमें संपर्क कर सकते हैं. हमारी ओर से आप सबको गुरु पूर्णिमा के हार्दिक बधाई. अंत में इन्ही शब्दों के साथ कलम को विराम देना चाहूँगा

आपकी नज़रें पड़ी तो कमल हो गए
आपकी बात करी तो गज़ल हो गए
हमारी हालत तो थी जैसे टूटा मकान
पर गुरुदेव आपका साथ मिला तो महल हो गए


Sunday, June 17, 2012

कहानी खाटू वाले श्याम बाबा की


बाबा श्याम को ये दिल नज़र कर चुकी हूँ
और बदले में उसके मै दर्द ले चुकी हूँ
वो तारे न तारे समझ उनकी अपनी
गुनाहों कि अपने खबर दे चुकी हूँ
है दावा अदालत में दीवानगी का
ज़मानत में दिल और जिगर दे चुकी हूँ
वो आयें न आयें समझ उनकी अपनी
मै मरने कि अपने खबर दे चुकी हूँ

इस कलयुग में हमारे ठाकुर जी कि पूजा तो होती है और साथ में उनका एक और रूप है जो देश-देशांतर में बहुत ही श्रधा भावना के साथ पूजा जाता है. वो रूप है हमारे खाटू श्याम जी का, लखदातार का, शीश के दानी का, हारे के सहारे का और बाबा श्याम प्यारे का. अपने इस लेख में मै बताना चाहता हूँ कि इन खाटू श्याम जी ने ऐसा क्या किया जो उन्हें प्रभु ने अपने नाम ही दान दे दिया. 

ये द्वापर युग में महाभारत के समय कि बात है, एक वीर बालक था जिसका नाम था बर्बरीक. वो इतना वीर था कि स्वयं सरस्वती और शेष नाग भी उसकी वीरता का बखान करने में असमर्थ थे. तो हमारे मुरली बजैया कृष्ण कन्हैया ने उस बालक की परीक्षा लेनी चाही. वो उस बालक के समक्ष गए और उसे कहा कि यदि तुम वीर हो तो अपनी वीरता का प्रमाण दो. अब ठाकुर जी यदि परीक्षा ले रहे हो तो कौन पीछे हटेगा और बर्बरीक तो स्वयं कृष्ण प्रेम में दीवाने थे. उन्होंने ठाकुर जी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. तो द्वारिकाधीश उन्हें एक पीपल के पेड़ के पास लेके गए और कहा कि तुम एक ही बाण से इस वृक्ष के सारे पत्तों में छेद कर दो और कृष्ण जी ने चुपके से उस पेड़ का एक पत्ता अपने पैर के नीचे छुपा लिया. बर्बरीक ने अपना बाण धनुष पे चढ़ाया और ठाकुर जी चरणों का स्मरण करके उसे वृक्ष की ओर छोड़ दिया. उस बाण ने वृक्ष के सारे पत्तों में छेद कर दिया और उसके बाद वो ठाकुर जी के चरणों के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगा. भगवन श्री कृष्ण ने बर्बरीक से कहा कि इस बाण को दूर करो ये मुझे चोट पहुंचा देगा, तो बर्बरीक ने कहा कि हे प्रभु, आप अपना पैर उस पत्ते के ऊपर से हटा लीजिए तभी ये बाण आपको मुक्त करेगा क्यूंकि एक वही पत्ता बचा है जिसे मेरे बाण ने नहीं छेदा. ठाकुर जी उस बालक कि वीरता देख कर गद्गद हो गए और अपने मन में विचार किया कि ये वीर है परन्तु बालक है. इसलिए दुर्योधन बड़ी सरलता से इसे अपनी ओर ले सकता है और यदि बर्बरीक कौरवों की तरफ से लड़ेगा तो पांडव महाभारत नहीं जीत सकते क्यूंकि ठाकुर जी अपने भक्त को भी नहीं हारता हुआ देख सकते. इसलिए प्रभु ने लीला रची और बड़े दीन हीन बनकर बर्बरीक से बोले कि मै तुमसे कुछ माँगना चाहता हूँ. यदि भक्तो के सामने ठाकुर जी झोली फैला लें तो उस समय का क्या मंज़र होगा और उस भक्ति का क्या आलम होगा, ये बयां कर पाना अत्यंत कठिन है. इसलिए बर्बरीक ने भी कह दिया कि मांग लो प्रभु यदि जाँ भी मांगोगे तो दे दूँगा. भगवान हँस कर बोले, बस बेटा वही चाहिए दे दे. मुझे अपने शीश का दान कर दे. और धन्य है बर्बरीक की भक्ति, कि उसने बिना किसी दुःख के अपना शीश प्रभु के चरणों में समर्पित कर दिया और प्रभु से विनती कि कि हे प्रभु, मै आपको अपना शीश तो दे रहा हूँ पर मेरी एक इच्छा थी कि मै माहाभारत के युद्ध को अपनी आँखों से देखूं, आप मेरी ये इच्छा पूरी करो. तो भगवन ने बर्बरीक का शीश एक पहाड़ी पर विराजमान करा दिया और कहा कि तुम निष्पक्षता के साथ युद्ध को देखो. जींद के पास पढाना नाम से आज भी वह गांव है जहा बर्बरीक ने अपना शीश दान दिया था और उस जगह श्याम बाबा का बड़ा सुंदर मंदिर बना हुआ है. 

सच में बंधुओ, हमारे ठाकुर जी बड़े निराले हैं, अपने भक्त की परीक्षा भी लेते हैं और यदि सफल हो जाओ तो जान भी मांग लेते हैं. इसलिए किसी भक्त ने कितना सुंदर कहा

सब कुछ लेके परीक्षा हैं लेते
अब कौनसी राह चले संसारी
ऐसा मोहक जाल बिछाये 
हा भैया, थक कर रह गयी बुद्धि बेचारी
सोच समझ के सौदा कीजो
ये नन्द का लाल बड़ा व्यापारी

महाभारत के युद्ध के पश्चात्, जब भगवान पांडवों के साथ जा रहे थे, तो पांडव अहंकार के मद् में चूर थे. उन्हें लग रहा था कि ये सब उनकी वीरता के कारण कुआ है, उन्हें लगा कि महाभारत का युद्ध उन्होंने अपने बल पे जीता है. पर ठाकुर जी ने उनका अहंकार तोड़ने के लिए बर्बरीक को अपने पास बुलाया और कहा कि तुमने पूरा महाभारत का युद्ध देखा है, मुझे बताओ तुमने क्या देखा. तप बर्बरीक बोले प्रभु मैंने तो कुछ नहीं देखा, मुझे तो सिर्फ आपका सुदर्शन चक्र दिख रहा था जो कुरुक्षेत्र कि रणभूमि में घूम घूम कर पापियों का विनाश कर रहा था. इतना सुनते ही पांडव शर्म से पानी पानी हो गए और प्रभु इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने बर्बरीक को यह वरदान दे दिया कि हे बेटा बर्बरीक, आज से तू मेरे नाम से जाना जायेगा, मै तुझे अपना नाम दान में देता हू तेरा नाम होगा श्याम, और तुझे कलयुग में मेरा अवतार मना जायेगा और खाटू नगर में तेरा विशाल मंदिर होगा जहा अनेक भक्त एके तेरी चौखट पे नाक राग्देंगे और तू उन्हें अभय दान प्रदान करना. 

इसलिए हमारे खाटू नरेश का बहुत विशाल दरबार है खाटू में और वह जो भक्त दर्शनों के लिए जाते है, वो बाबा के ही हो जाते हैं. जो जादू हमारे वृन्दावन के बांके बिहारी के विग्रह में है, वही जादू, वही नशा और वही शांति खाटू नरेश के शीश में भी है. मै ये सुनी सुनाई बात नहीं कह रहा हूँ, मुझे खुद अनुभव हुआ क्यूंकि इस द्वादशी को श्याम बाबा ने प्रथम बार मुझे अपने दर पे बुलाया और मैंने बाबा के दर्शन किये तो मन में यही भव आया

सूरत ऐसी कि सब गुलामी करें
और कदम इसे कि फ़रिश्ते भी चूमा करे
जिसने देखा तुझे एक बार मेरे बाबा
वो होके दीवाना खाटू कि गलियों में घूमा करे


खाटू नरेश की जय
हारे के सहारे की जय
~~~~~ बोलो श्याम प्यारे की जय ~~~~~
नीले घोड़े वाले की जय
तीन बाण धारी की जय