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Friday, April 20, 2012

अक्षय तृतीया

वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया को हमारे भारत वर्ष में अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है. अक्षय का अर्थ होता है जो कभी नष्ट न हो. हमेशा हमारे साथ रहने वाली वस्तु को अक्षय कहा जाता है. हम भारतियों का ऐसा मानना है कि इस शुभ दिन हम जो भी कार्य करते हैं, उसका फल हमें सदा मिलता रहता है. इसलिए हम लोग इस दिन अपने खजाने को भरते हैं अर्थार्थ ऐसी विधि है कि लोग इस दिन कुछ स्वर्ण कि वस्तु खरीद लेते हैं क्यूंकि उनका ऐसा विश्वास है कि इस दिन खरीदा गया सोना कभी साथ नहीं छोड़ेगा.


मुझे इस विचार से कोई आपत्ति नहीं है, परन्तु बंधुओ ज़रा सोचिये कि इस संसार में ऐसी कौनसी चीज़ है जो हमारा साथ कभी नहीं छोडेगी. यदि वेह वस्तु हमसे अलग नहीं होगी तो एक दिन हमें उस वस्तु का त्याग करना होगा क्यूंकि इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है. यदि कोई ऐसी चीज़ है जो हमेशा हमारे साथ रहेगी तो वो है हमारे बांके बिहारी और हमारी राधा राणी का नाम. इसलिए हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम इस दिन अपनी तिजोरी को तो भरें पर अपने प्रभु को भी याद कर लें क्यूंकि वास्तविकता में अक्षय तो वही हैं. केवल प्रभु कि कृपा ही है, केवल हमारे गुरुजनों का आशीर्वाद ही है और केवल हमारे माता-पिता का प्यार ही है जो हमारा साथ कभी नहीं छोड़ता. 

हमारे रसिक चक्र चूडामणि स्वामी श्री हरिदास जी महाराज कहते हैं:

हरी को ऐसो ही सब खेल 
मृग तृष्णा जग व्याप रह्यो है, कहूँ बिजोरी न बेल 
धन मद् जोबन मद् रज मद्, ज्यों पंछिन में डेल
कहें श्री हरिदास यही जिया जानो, तीरथ को सो मेल 

स्वामी जी कहते हैं कि ये जग तो एक शिकारी का जाल है जो ऊपर से देखने में तो बड़ा सुंदर प्रतीत होता है परन्तु जब जीव इसमें फंस जाता है, तो उसके पास पश्चाताप के सिवा कोई मार्ग नहीं बचता. यहाँ तो सब मृग मतलब हिरन कि भांति हैं, सच्ची कस्तूरी हिरन कि नाभि में होती है और उसकी सुगंध से मोहित होकर वेह उसको पूरे जंगल में ढूँढता फिरता है. उस बेचारे को यह नहीं पता कि जिस सुगंध के लिए वो मारा मारा फ़िर रहा है वेह सुगंध उसी के शरीर का हिस्सा है. उसी प्रकार बंधुओ हम भी माया मोह के पीछे भागते हैं और यह नहीं जानते कि सारी दुनिया कि दौलत वो इश्वर तो हमारे भीतर ही विराजमान है. तीरथ को सो मेल, इस पंक्ति से स्वामी जी बताना चाहते हैं कि अरे मूर्ख यह जग तेरा नहीं है, यहाँ तो तू एक यात्रा के लिए आया है. जिस प्रकार जब हम किसी तीर्थ में जाते हैं, तो हम वहां के मंदिर, उनकी भव्यता, वहां के पुष्प, वहां के बाघ-बगीचे, हम तीर्थ कि प्रत्येक वस्तु का आनंद उठाते हैं यह जानते हुए कि इनमे से कुछ भी हमारा नहीं है. हमें तीर्थ में हमारे ही जैसे सह-यात्री भी मिलते हैं, उनसे हमारा रिश्ता भी बनता है परन्तु वो रिश्ता तभी तक है जब तक हम वहां हैं. एक बार हम वापिस अपने ठिकाने पे पहुच जाते हैं तो हमारे पास बस हमारी यार्ता कि यादें शेष रह जाती हैं. उसी प्रकार से ये दुनिया और यहाँ के रिश्ते भी तीर्थ के मिलन के समान है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारा असली ठिकाना तो बांके बिहारी के चरणों में है.

बंधुओ, अपने ठाकुर जी के चरणों के बारे में तो मै कहा तक लिखूं. इनके चरनी कि महिमा का मै कहा तक बखान करूँ. स्वयं गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज राम चरिता मानस में कहते हैं कि ठाकुर जी के चरणों कि महिमा तो अनंत है, कोई भी कवी कोई भी लेखक पूर्ण रूप से उनके चरणों कि व्याख्या नहीं कर सकता आप तो बस इतना समझ लें कि स्वयं राम भी राम चरण कि महिमा नहीं गा सकते. सूरदास जी महाराज ने अपने पद में ठाकुर जी के चरनी के विषय में बड़ा सुंदर लिखा है:

बन्दऊ चरण कमल हरी राय 
जाकी कृपा पंगु गिरी लांघे, अंधे को सब कछु दर्शाए 
बहिरो सुने, मूक पुनि बोले, रंक चले सिर छत्र धराए 
सूरदास स्वामी करुनामय, बार बार बंदों तेहि पाएं 



सूरदास जी कहते हैं कि मेरे बांके बिहारी के चरणों के दर्शन कि महिमा तो इतनी विशाल है और उनकी महिमा तो इतनी अद्भुत है कि सारे असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं. लंगड़ा व्यक्ति पर्वत पार कर जाता है, अंधे को सब कुछ दिखने लगता है, बहरा सुन सकता है, गूंगा बोल सकता है और तो और एक भिखारी भी अपने सिर पर छत्र धरा सकता है. प्रभु के चरण दर्शन बहुत ही दुर्लभ है. बड़े बड़े योगी और साधक अनेक वर्षों तक ताप करते हैं परन्तु उन्हें प्रभु के चरणों का दर्शन प्राप्त नहीं होता. पर भक्तों के आगे तो प्रभु भी नतमस्तक हैं. आपने श्री धाम वृन्दावन में जब बिहारी जी के दर्शन किये होंगे तो अपने देखा होगा कि प्रभु के चरण नहीं दिखते. पूरे वर्ष में केवल एक दिन, इस अक्षय तृतीय को हमारे ठाकुर जी अपने प्रिय भक्तो पर कृपा करते हैं तो अपने चरण कमल के दर्शन का सौभाग्य प्रदान करते हैं. और संध्या के समय तो वो कुछ अधिक ही कृपालु हो जाते हैं. संध्या कल्लें दर्शनों में ठाकुर जी अपने सारे वस्त्र उतार देते हैं. अपनी कमर से केवल एक धोती बंधे हुए वो भक्तो को अपने संपूर्ण अंग का दर्शन देते हैं. ब्रज में इसे सर्वांग दर्शन भी कहा जाता है. 

तो बंधुओ, इस अक्षय तृतीय पर लौकिक नहीं अलौकिक को पाने का प्रयत्न करिये. प्रभु का प्रसाद पाइए जो नश्वर नहीं है. हमारा इतिहास हमें दान करना सिखाता है, किसी ज़रूरतमंद को दान दीजिए और उसकी दुआ लीजिए क्यूंकि बुरे वक़्त में पैसा या रिश्ते काम नहीं आते, बुरे वक्त में तो केवल दुआ ही काम आती है. 

~~~~~~~~~~~ जय बिहारी जी की ~~~~~~~~~~~

विशेष प्रसारण 

देखिये पूज्य बड़े गुरुदेव परम श्रधेय आ० गो० श्री मृदुल कृष्ण शास्त्री जी महारज द्वारा भागवत कथा का विशेष प्रसारण केवल अध्यात्म चैनल पर 

दिनांक : 21 अप्रैल से 27 अप्रैल 
समय : सांय 03 बजे से 07 बजे तक
स्थान : सारंगगढ़, छत्तीसगढ़ 





Wednesday, April 4, 2012

कैलाश-मानसरोवर यात्रा एवं आगामी कार्यक्रम

                                                         



कैलाश  मानसरोवर यात्रा      

एवं 

श्री मद् भागवत कथा      

श्रधेय मृदुल कृष्ण जी महाराज 
के पावन सानिध्य में                 

दिनांक: 12 मई से 25 मई, 2012 तक

स्थान: भोले बाबा की नगरी, मानसरोवर  

(अधिक जानकारी के लिए श्री भगवत मिशन ट्रस्ट, पटेल नगर में संपर्क करें)

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आगामी कार्यक्रम 

परम श्रधेय आ० गो० श्री मृदुल कृष्ण शास्त्री जी महाराज 

13 अप्रैल से 19 अप्रैल, 2012 : सरंग्गढ़, छत्तीसगढ़  

12 मई से 25 मई, 2012 : कैलाश, मानसरोवर  


परम श्रधेय आ० श्री गौरव कृष्ण गोस्वामी जी महाराज 

06 अप्रैल से १२ अप्रैल, 2012 : अलीगढ, उत्तर प्रदेश  
(इस कथा का विशेष प्रसारण 07 अप्रैल से सुबह 10:00 बजे से केवल अध्यात्म चैनल पर)

24 अप्रैल से 30 अप्रैल, 2012 : हैदराबाद, आंध्र प्रदेश 

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आप सब राम भक्तों को हमारी और से हनुमान जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं 

जय श्री राधे 

जय श्री राम 

जयकारा वीर बजरंगी 
हर! हर! हर!  महादेव 

                       




Tuesday, March 20, 2012

राधा कृपा कटाक्ष


मांगने वाले खाली न लौटे, कितनी मिली खैरात न पूछो 
अरे उनकी कृपा तो उनकी कृपा है, उनकी कृपा की बात न पूछो 

भक्तो, हमारी राधा राणी कितनी दयालु हैं, ये शायद किसी को भी बताने कि आवश्यकता नहीं है परन्तु फ़िर भी न जाने क्यों मन में बार बार यही विचार आ रहा है कि मै राधे जू कि कृपा के विषय में लिखूं. इनका दरबार तो ऐसा है जहा हर प्रकार के जीव को गले से लगाया जाता है. इतनी कृपा हमारे ठाकुर जी तो कर ही नहीं सकते जितनी कृपा वो बरसाने वाली बरसा देती हैं. बांके बिहारी तो वैसे ही भक्तो की आहों के आशिक हैं पर राधे जू अपने भक्तों कि आँखों में आंसू नहीं देख सकते. जिस जीव पर राधा राणी कृपा कर दें, फ़िर वो तो बांके बिहारी से मुकाबला करने के काबिल हो जाता है. 

ऐसा ही एक प्रसंग मेरा लिखने का मन कर रहा है. बरसाने के पास एक छोटा सा स्थान है मोर-कुटी. इस स्थान कि महिमा मै बताने जा रहा हूँ. एक समय की बात है जब लीला करते हुए राधा जी प्रभु से रूठ गयी और वो रूठ के मोर-कुटी पर जा के बैठ गयी और वहां एक मोर से लाड करने लगी. जब हमारे ठाकुर जी उन्हें मनाने के लिए मोर-कुटी पर पधारे तो देखा कि राधे जू हमसे तो रूठ गयी और उस मोर से प्यार कर रही हैं. ठाकुर जी को उस मोर से इर्ष्या होने लगी. वो राधा राणी को मनाने लगे तो किशोरी जी ने ये शर्त रख दी कि हे! बांके बिहारी मेरी नाराज़गी तब दूर होगी जब तुम इस मोर को नृत्य प्रतियोगिता में हरा कर दिखाओगे. ठाकुर जी इस बात पर राज़ी हो गए क्यूंकि उस नन्द के छोरे को तो नाचने का बहाना चाहिए. और जब राधा राणी के सामने नाचने कि बात हो तो कौन पीछे हटे. प्रतियोगिता प्रारंभ हुई, एक तरफ मोर जो पूरे विश्व में अपने नृत्य के लिए विख्यात है और दूसरी ओर हमारे नटवर नागर नन्द किशोर. प्रभु उस मयूर से बहुत अच्छा नाचने लगे पर फ़िर किशोरी जी को लगा कि यदि बांके बिहारी जीत गए तो  बरसाने के मोर किसी को मुह नहीं दिखा पाएंगे कि स्वयं राधा के गांव के मोर एक ग्वाले से न जीत सके. इसलिए किशोरी जी ने अपनी कृपामयी दृष्टि उस मोर पर डाल दी और फ़िर वो मोर ऐसा नचा कि उसने ठाकुर जी को थका दिया. सच है बंधुओ जिस पर मेरी राधे जू कृपा दृष्टि डाल दे, वो तो प्रभु को भी हरा सकता है. जिसने राधा राणी के प्यार को जीत लिया समझो उसने कृष्ण जी को भी जीत लिया क्यूंकि ठाकुर जी तो हमारी किशोरी जी के चरणों के सेवक है. हम यदि अपनी जिह्वा से राधा नाम गाते हैं, तो उसमे हमारा कोई पुरुषार्थ नहीं है, वो तो उनकी कृपा ही है जो हमारे मुख पर उनका नाम आया. और बंधुओ पूरा राधा कहने कि भी आवश्यकता नहीं है, आप अपनी वाणी कहो सिर्फ "रा", ये रा सुनते ही बांके बिहारी के कान खड़े हो जाते हैं और जब आप आगे बोलते हो "धा" मतलब आप बोलते हो "राधा", तो बांके बिहारी के कान नहीं फ़िर तो बांके बिहारी ही खड़े हो जाते हैं उस भक्त के साथ चलने के लिए. 

जैसा कि गुरूजी कथा में भी बताते है, सात वर्ष के छोटे से कन्हैया ने सात कोस का बड़ा सा गोवेर्धन यदि उठाया था तो केवल राधा कृपा कटाक्ष के बल पर उठाया थ और इस बात कि पुष्टि खुद ठाकुर जी ने यही कह कर की है:
कछु माखन कूँ बल बढ्यो 
कछु गोपन करो सहाय
श्री राधे जू कि कृपा ते 
मैंने गिरवर लियो उठाए

राधा राणी की ठकुराई कि मै कहा तक चर्चा करूँ. किसी जीव कि तो छोडो, यदि राधे न चाहे तो बांके बिहारी भी ब्रज में नहीं रह सकते. जब कंस को मरने के लिए प्रभु मथुरा गए थे और फ़िर उद्धव को भेजा था ब्रज में अपना सन्देश देकर, तो राधा राणी के लिए उन्होंने यही सन्देश भेजा था:
हे वृषभानु सुते ललिते, मम कौन कियो अपराध तिहारो 
काढ दियो ब्रज मंडल ते, अब औरहु दंड दियो अति भारो
सो कर ल्यो अपनों कर ल्यो, निकुंज कुटी यमुना तट प्यारो
आप सों जान दया कि निधान, भई सो भई अब तेरो सहारो 

ये तो सारी पुराणी बातें हैं, पर पिछले दिनों उनकी एक कृपा मेरे ऊपर भी बरसी. मुझे अपने एक विशेष भक्त का सानिध्य उन्होंने प्रदान किया. उन्होंने मेरा मिलन हम सबके प्रिय, भक्त श्री प्रिंस वर्मा जी से करवा दिया. इस जीवन से और क्या आशा करें, वो गुरूजी का, अपने भक्तों का संग प्रदान कर देती हैं अपने चरणों की मस्ती देती हैं. उनकी कृपा के किस्से खतम नहीं होने वाले, मै कहाँ तक लिखूं.
जब तेरी इनायत पे मेरी नज़र जाती है
हे वृषभानु लली मेरी आँख भर आती है
कुछ मांगने की तो आज तक ज़रूरत ही नहीं पड़ी
हाथ उठने से पहले दुआ कबूल हो जाती है



हम सब भक्तो पर कृपा करने के लिए अब वो किशोरी जी माँ दुर्गा बनके हमारे घरों में पधारेंगी और नौ दिनों तक अपने भक्तो के साथ ही रहेंगी. वासंतीय नवरात्र शुक्रवार २३ मार्च, २०१२ से प्रारंभ हो रहे हैं, वो मैया ही दुर्गा हैं, वही काली हैं और वहो राधा रूप भी हैं. मेरी उनके श्री चरणों में यही प्रार्थना है कि उनके सारे भक्त सुखी रहें, निरोगी रहें और किसी को कोई दुःख न सताए. माँ अपनी अमृतमयी दृष्टि आपके और आपके परिवार पर सदा बनाये रखें.  
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःख भाग भवेत्

 यदि हम अपनी संस्कृति के अनुसार देखें तो हमारा नया साल तो अब आया है. जनवरी में हमारा नया साल नहीं होता. आइये हम सब भारतीय नव वर्ष मनाये और मेरा अनुरोध है कि आप अधिक से अधिक मात्रा में इस नव वर्ष कि बधाई अपने मित्रों को दें जिससे हमारी संस्कृति एक बार फ़िर जिन्दा हो जाये और उसका प्रचार हो. आप सबको हमारे परिवार कि ओर से वासंतीय नवरात्रों और नव संवत २०६९ की हार्दिक शुभकामना. 

~~~~~~***~~~~~ जय माता दी ~~~~~***~~~~~




Monday, March 12, 2012

Upcoming Programmes and Special Information

श्रधेय आ० श्री गौरव कृष्ण गोस्वामी जी 
द्वारा
 श्रीमद् भागवत कथा 

दिनांक: 16 मार्च से 22 मार्च 

कथा स्थल: सोनीपत, हरियाणा


"SHRIMAD BHAGWAT KATHA"
ON

We were constantly receiving requests from various devotees that they want to express their views on our blog. But it is not possible for us to give recognition to the views of each and every devotee. But now we have designed our page on the most famous Social Networking Site FACEBOOK by the name of SHRIMAD BHAGWAT KATHA. Devotees are requested to like this page and post their views on it. If you want to get your views published on the blog, you can post it on Facebook page with your name and location. If possible we will surely publish your articles. Also you can get quotes, thoughts, upcoming programmes of guruji and other relevant information about guruji. Even all the devotees can post their devotional views. 


Sunday, March 11, 2012

Prem Madhuray : A New Religious Website.


SHRI GAURAV
KRISHNA GOSWAMI JI AT SURAJGARH,JHUNJHUNU.




"PREMMADHURAY" website shri
nitynikunjvihariji ko samarpit hai.is website ke liye SHRI GAURAV KRISHNA GOSWAMI JI ne vishesh ashirwad diya
h or kaha h-"isi prakar khub kishoriji ke  liye karya karo".

please visit-www.premmadhuray.in


Thursday, February 23, 2012

श्री धाम वृन्दावन का होली महोत्सव


बिहारी बिहारिणी की रे मोपे यह छवि बरनी न जाये 
रंग महल में होली खेलें, अंग अंग रंग छु छाए 
तन मन मिले जुले मृदु रस में, आनंद उर न समाये 
श्री हरिदास ललित छवि निरखें, सेवत नव नव भाये 

हमारे श्री धाम वृन्दावन के रसिक सम्राट, रसिक चक्र चूडामणि, परम श्रधेय आचार्य स्वामी श्री हरिदास जी महाराज ने इस पद की रचना की. वो युगल सरकार की होली लीला का अपने ध्यान में दर्शन कर रहे है और सबसे पहले स्वामी जी यही कह रहे है कि मै श्यामा श्याम की उस छवि का वर्णन नहीं कर सकता. वो रंग महल में होली खेल रहे हैं और उनका अंग अंग रंग से भीगा हुआ है. स्वामी जी कहते हैं कि उनका तन और मन पुलकित हो रहा है और इस छवि को देख के स्वामी जी को इतना आनंद हो रहा है कि इस आनंद को अपने ह्रदय में समेट नहीं पा रहे हैं. 

स्वामी जी के इस पद के भाव तो इतने गंभीर हैं की उन्हें इस लेख की सीमओं में बाँध पाना असंभव है. वो नित्य वृन्दावन (निधिवन) में इस लीला का दर्शन कर रहे हैं और स्वयं इस बात को मानते हैं इस छवि का वर्णन नहीं किया जा सकता. निधिवन कोई सामान्य स्थल नहीं है, वो तो प्रेम का सिन्धु है और राधा कृष्ण इस प्रेम सिन्धु की एक बूँद के रूप में ब्रज में प्रकट हुए हैं. वो यमुना के तीर पे और कुंजों में जब नृत्य करते हैं, तो वो सब भक्तों के लिए एक खुली तिजोरी के समान है जिसमे ठाकुर जी खुद कहते हैं की आओ मुझे छुओ, मुझे अनुभव करो और मेरे साथ नाचो, तुम मुझे प्यारे हो, तुम मेरे हो, आके लूट लो मुझे. तो इस होली पर चलिए ठाकुर जी के रंग में अपने आप को रंग लें और उनके कृपा के महासागर में डूब जाएँ.

अब ज़रा इस बात को जान ले की श्री धाम वृन्दावन में यह दिव्य त्यौहार किस प्रकार से मनाया जाता है. प्रभु के धाम में होली ५ दिन तक खेली जाती है. फाल्गुन शुक्ला एकादसी (आनोला एकादसी) से प्रारंभ होकर फाल्गुन की पूर्णिमा तक ठाकुर जी होली खेलते हैं. वैसे तो होली का रंग बिहारी जी पे बसंत पंचमी के दिन ही चढ़ जाता है. बसंत पंचमी के दिन पहली बार बिहारी जी के मंदिर में शयन आरती के वक़्त गुलाल उड़ाया जाता है. और फाल्गुन के तो पुरे महीने में ठाकुर जी के गाल गुलाल से सुशोभित होते है. चटकीले रंग की पोषक पहने, बांकी पगड़ी धारण किये हुए ठाकुर जी ऐसे मुस्कुराते हो मनो मोहिनी ने अपना डेरा डाल लिया हो. उनके माथे मर एक बड़ी सी बिंदी, और उसके नीचे वो मोटे मोटे कजरारे कजरारे नैन, जिनमे वही शरारत भरी हुई रहती है. और एकादसी से तो पूर्ण रूप से होली शुरू हो जाती है और होलिका दहन तक मनाई जाती है. इस बीच ठाकुर जी अपना कमरा छोड़ के भक्तो के पास आ जाते हैं जहाँ उनके लिए एक प्यारा सा चांदी का घरोंदा बनाया जाता है और ठाकुर जी वहां से खूब रंग बरसाते है. ठाकुर जी सफ़ेद रंग की सुंदर पोषक पहन के अपने दर्शन खोलते है और शाम तक बिहारी जी के कपडे हर रंग में रंग जाते है. रंग से सराबोर ठाकुर जी की छवि का क्या नज़ारा होता होगा, इसका वर्णन मै क्या कोई भी नहीं कर सकता, उसका तो केवल दर्शन ही किया जा सकता है. ठाकुर जी को लगाये जाने वाला रंग टेसू के फूलों को उबाल कर तैयार किया जाता है. मंदिर के गोस्वामी इस रंगीन पानी को भक्तो पर डालते रहते है. इसके अतिरिक्त चन्दन और गुलाब का पानी भी भक्तो पर लुटाया जाता है. सूखे रंग मंदिर में पूरा दिन उड़ते रहते है और भक्त केवल एक ही धुन गाते रहते है : होली है ; होली है ; होली है. भक्तों की टोलियाँ मंदिर में होली के रसिया गाते हैं. आप सब भी पूज्य गुरुदेव के साथ मिलकर गाते ही होंगे, पूज्य गुरुदेव ने अपनी सुमधुर आवाज़ में कितने सुंदर भजन गाये हैं.


आये फाग खेलन, गोपाल बरसाने में 
गावे ख्याल, देदे ताल उर हर्षत है
इत ते किशोरी गोरी, सखियों के ऊथ महान
लेके अबीर पे कपोल पर्सत है 
कंचन पिचकारी मारी ताकि बिहारी ने 
लाल बलबीर प्रति अंग दर्शत है 
छतन ते, छज्जन ते, झरोखन ते, मोखन ते, 
आज नन्द लाल पे गुलाल बरसत है

होलिका दहन के अगले दिन, अर्थात चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को दुल्हेंदी कहते है. पूरे देश में तो होली का आनंद इसी दिन मनाया जाता है, पर जैसे हमारे ठाकुर जी बांके है उसी तरह उनका त्यौहार मनाने का समय भी बांका ही है. जब पूरा देश होली खेलना शुरू करता है, उस दिन ठाकुर जी की होली विश्राम की ओर बढ़ जाती है. इस दिन चांदी के घरोंदे की जगह सोने का एक विशाल सिंहासन ले लेता है जिसपर ठाकुर जी विराज कर भक्तो को देखते है. रिवाज़ के अनुसार बांके बिहारी जी होली नहीं खेलते. मंदिर के परदे जो अब तक रंग में सन चुके होते हैं, उन्हें भी उतार कर नए परदे लगा दिए जाते है. इस दिन मंदिर के गोस्वामी भी भक्तो पर रंग नहीं डालते और भक्त अपने साथ ही गुलाल ले जाते हैं और आपस में एक दूसरे के साथ होली खेलते हैं. ठाकुर जी फूल डोल में बैठे बैठे मुस्कुराते है.


आप सब भक्तों को हमारे परिवार की ओर से और पूज्य गुरुदेव की ओर से होली कि बहुत बहुत शुभकामना. यह त्यौहार आपकी जिंदगी में रंग भर दे, आप सब स्वास्थ्य से तंदरुस्त रहे, अपने अपने कार्यों में व्यस्त रहे और बिहारी जी की मस्ती में मस्त रहे. हमारी यही मंगल कामना है. 

~~~~~ श्री राधे ~~~~~ होली की हार्दिक बधाई ~~~~~ श्री राधे ~~~~~

वार्षिक होली महोत्सव के पवन पर्व पर 

१०८ श्रीमद भगवत कथा का आयोजन 


कथा व्यास विश्व विख्यात भगवत रत्न 
परम श्रधेय आचार्य गो० श्री मृदुल कृष्ण शास्त्री जी महाराज 

दिनांक:
1 मार्च से 7 मार्च, 2012 

समय:
दोपहर 03:00 बजे से सायें 07:00 बजे तक 


स्थान:
श्री राधा स्नेह बिहारी मंदिर, बिहारीपुरा, वृन्दावन