सम्पूर्ण ब्रज-मण्डल का हर - कण, हर - वृक्ष, हर - स्थल, पावन - कुण्ड और श्री यमुनाजी श्रीप्रिया-प्रियतम की नित्य निकुंज लीलाओं के साक्षी हैं। श्री कृष्ण जी ने अपने ब्रह्मत्व का त्याग कर सभी ग्वाल बालों और ब्रज गोपियों के साथ अनेक लीलाएँ की हैं। यहाँ उन्होने अपना बचपन बिताया। जिसमें उन्होने ग्वाल बालों के साथ क्रीड़ा, गौ चारण, माखन चोरी, कालिया दमन आदि अनेक लीलाएँ की हैं। भगवान कृष्ण की इन लीलाओं पर ही ब्रज के नगर, गाँव, कुण्ड, घाट आदि स्थलों का नामकरण हुआ है। एक बार नन्दबाबा और यशोदा मैया ने सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन-यात्रा पर जाने की इच्छा प्रकट की। तो श्री कृष्ण जी ने उनसे कहा, "मैया, मैं सारे तीर्थों को ब्रज में ही बुला लेता हूँ। तुम ब्रज में ही सभी तीर्थ-स्थलों की दर्शन-यात्रा कर लेना। अतः समस्त तीर्थ ठाकुर जी की आज्ञानुसार ब्रज में निवास करने लगे। ब्रज चौरासी कोस दर्शन यात्रा करने से सभी तीर्थ स्थलों जैसे बद्रीनाथ, जगन्नाथ धाम, मानसरोवर आदि के दर्शन का पुण्य-लाभ मिल जाता है।
ब्रज-यात्रा का महत्व
ब्रज चौरासी कोस की परिकम्मा एक देत ।
लख चौरासी योनि के संकट हरिहर लेत ॥
श्री ब्रजमण्डल श्री राधाकृष्ण की नित्य लीला भूमि है। सम्पूर्ण ब्रजमण्डल 84 कोस (लगभग 252 कि.मी.) के अन्तर्गत आता है। ब्रजमण्डल के सभी दर्शनीय स्थल श्री श्यामा-श्याम की किसी न किसी लीला के कारण महत्वपूर्ण हैं।यहाँ के खग-मृग, पशु, लता, वृक्ष, कुण्ड, पर्वत, यमुनाजी आदि सभी परम दिव्य एवं चिन्मय हैं। बृज की ऐसी विलक्षण महिमा है कि स्वयं मुक्ति भी इसकी आकांक्षा करती है -
मुक्ति कहै गोपाल सौ मेरि मुक्ति बताय।
ब्रज रज उड़ि मस्तक लगै मुक्ति मुक्त हो जाय॥
ऐसा माना गया है कि ब्रज-धाम की परिक्रमा-यात्रा सर्वप्रथम चतुर्मुख ब्रह्मा जी ने की थी। वत्स हरण के पश्चात् उनके अपराध की शान्ति के लिये स्वयं श्रीकृष्ण ने उन्हें ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा करने का आदेश दिया था। तभी से ब्रज यात्रा का सूत्रपात हुआ, जिसे आज भी लाखों भक्त प्रतिवर्ष करते हैं। ब्रज चौरासी कोस की यात्रा करने से मनुष्य को चौरासी लाख योनियों से छुटकारा मिल जाता है।